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  • दिल्ली में एच1एन1 का प्रकोप, 24 घंटे में 166 नए मामले, स्वास्थ्य मंत्री ने तैयारियों का लिया जायजा

    दिल्ली में एच1एन1 के बढ़ते मामलों के बीच स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने द्वारका स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल का निरीक्षण कर तैयारियों का जायजा लिया. पिछले 24 घंटों में राजधानी में एच1एन1 के 166 नए मामले सामने आए हैं, जिसके बाद कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 2,612 हो गई है. वहीं, इन्फ्लूएंजा-A के कुल मामले करीब 3,300 तक पहुंच गए हैं. दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने अस्पताल में बनाए गए विशेष एच1एन1 आइसोलेशन वार्ड का निरीक्षण किया और मरीजों के इलाज और देखभाल की व्यवस्थाओं की समीक्षा की.

    उन्होंने अस्पताल के डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों से बातचीत कर बेड, ऑक्सीजन, दवाइयों, फ्लूइड, टेस्टिंग और अन्य जरूरी चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता की जानकारी ली.

    अस्पताल में एच1एन1/स्वाइन फ्लू के लिए विशेष क्लिनिक भी बनाया गया है. यहां संदिग्ध मरीजों की प्रारंभिक जांच की जाएगी. संक्रमण की पुष्टि होने पर मरीजों को आवश्यकता के अनुसार विशेष एच1एन1 वार्ड में भर्ती कर इलाज और निगरानी की जाएगी.

    क्या बोले स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज

    स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने कहा कि दिल्लीवासियों को घबराने की जरूरत नहीं है. दिल्ली सरकार और स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह तैयार हैं. अस्पतालों में डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, लैब टेक्नीशियन, दवाएं, ऑक्सीजन, बेड और टेस्टिंग सुविधाएं उपलब्ध रखी गई हैं. स्वास्थ्य मंत्री डॉ पंकज सिंह ने कहा कि सरकार संभावित रूप से मामलों में होने वाली बढ़ोतरी को देखते हुए पहले से तैयारियां कर रही है. जरूरत पड़ने पर अस्पतालों की क्षमता और चिकित्सा सुविधाओं को और मजबूत किया जाएगा. स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि वह स्वयं स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं और नियमित रूप से अस्पतालों का निरीक्षण कर रहे हैं.

    स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और मेडिकल सुपरिटेंडेंट/मेडिकल डायरेक्टर को सभी जरूरी तैयारियां सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं. उन्होंने कहा कि ये निरीक्षण आगे भी जारी रहेंगे और जरूरत पड़ने पर वह किसी भी समय किसी भी अस्पताल का दौरा कर सकते हैं. उन्होंने अस्पताल में लोगों को एच1एन1 से बचाव, लक्षणों और सावधानियों के प्रति जागरूक करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे आईईसी मटेरियल की भी समीक्षा की.

    स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि मौजूदा स्थिति पर स्वास्थ्य विभाग गंभीरता से नजर रख रहा है और मरीजों को समय पर बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं. अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और लैब टेक्नीशियन समेत जरूरी चिकित्सा संसाधन उपलब्ध हैं.

    इन चीजों का ध्यान रखने के निर्देश

    स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में दिल्ली सरकार मौसमी बीमारियों से निपटने के लिए स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रही है. सभी सरकारी अस्पतालों को सतर्क रहने और मामलों में बढ़ोतरी होने पर तत्काल प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं.

    स्वास्थ्य मंत्री ने दिल्लीवासियों से अपील की कि वे अनावश्यक रूप से भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें, नियमित रूप से साबुन-पानी से हाथ धोएं या सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें. उन्होंने बच्चों और बुजुर्गों की विशेष देखभाल करने तथा किसी भी स्वास्थ्य संबंधी परेशानी की स्थिति में चिकित्सकीय सलाह लेने की अपील की.

    उन्होंने कहा कि एच1एन1 के लक्षण सामान्य मौसमी फ्लू या बुखार जैसे हो सकते हैं और उचित इलाज एवं चिकित्सकीय निगरानी से मरीज ठीक होकर घर लौट रहे हैं. दिल्ली सरकार का लक्ष्य किसी भी संभावित स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार रहना और मरीजों को समय पर जरूरी उपचार उपलब्ध कराना है.

  • क्या कोरोना की तरह देशभर में फैल सकता है स्वाइन फ्लू? क्या कहते हैं डॉक्टर

    दिल्ली में एच1एन1 इंफ्लुएंजा के बढ़ते मामलों ने लोगों और राज्य सरकार की चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक 24 घंटे में 166 नए केस सामने आए हैं. इस नए अपडेट के बाद इसके मरीजों की संख्या बढ़कर 2,612 हो गई है. इसके अलावा इन्फ्लूएंजा-ए के मामले भी सामने आ रहे हैं और इन्हें मिलाकर कुल केस करीब 3,300 तक पहुंच गए हैं. दिल्ली सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि राज्य के लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है. सरकार और हेल्थ डिपार्टमेंट पूरी तरह तैयार है. हॉस्पिटल्स में डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, लैब टेक्नीशियन, दवाएं, ऑक्सीजन, बेड और टेस्टिंग सुविधाएं उपलब्ध रखी गई हैं.

    एच1एन1 के मामले बढ़ने के बाद लोगों के मन में यह सवाल आना लाजमी है कि कहीं यह भी कोरोना की तरह पूरे देश में तो नहीं फैल रहा. फिलहाल दोनों की तुलना करना सही नहीं होगा. एच1एन1 नया वायरस नहीं है.

    डॉक्टर ने क्या कहा?

    यशोदा अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन विभाग में एसोसिएट डायरेक्टर डॉ विनय भट्ट ने बताया कि यह इन्फ्लुएंजा वायरस है और इसके मामले समय-समय पर बढ़ते रहे हैं. वे कहते हैं कि मामलों में बढ़ोतरी को सीधे कोरोना जैसी स्थिति मान लेना ठीक नहीं है. एच1एन1 एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक आसानी से पहुंच सकता है, खासकर जब लोग लंबे समय तक एक-दूसरे के करीब हों.

    भीड़ वाली जगहों और बंद कमरों में इसका संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा रहता है. यही वजह है कि एक समय में किसी इलाके या शहर में इसके मामले बढ़ते हुए दिखाई दे सकते हैं.

    इन लोगों में है ज्यादा खतरा

    अधिकतर लोगों में एच1एन1 फ्लू की तरह ही रहता है और कुछ दिनों में आराम के साथ ठीक हो जाता है. लेकिन हर मरीज का जोखिम एक जैसा नहीं होता. बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से अस्थमा, सीओपीडी या दूसरी गंभीर बीमारी वाले मरीजों में संक्रमण ज्यादा गंभीर हो सकता है. ऐसे मरीजों में फेफड़ों तक संक्रमण पहुंचने और निमोनिया होने का खतरा रहता है.

    अगर बुखार लगातार बना हुआ है, खांसी बढ़ रही है या मरीज को सांस लेने में परेशानी हो रही है, तो इसे सामान्य फ्लू समझकर घर पर इंतजार नहीं करना चाहिए. सांस फूलना, सीने में दर्द या ऑक्सीजन का स्तर गिरना खास तौर पर चिंता के संकेत हैं.

    इन बातों का रखें ध्यान

    एच1एन1 से बचाव में फ्लू वैक्सीनेशन भी अहम भूमिका निभा सकता है, खासकर बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हाई-रिस्क मरीजों के लिए. समय पर टीकाकरण संक्रमण के गंभीर होने और उससे जुड़ी जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है और हाई-रिस्क मरीजों में अस्पताल में भर्ती होने की संभावना भी कम हो सकती है.

    फिलहाल एच1एन1 से बचने के लिए बहुत अलग कुछ करने की जरूरत नहीं है. बीमार हैं तो कुछ दिन घर पर रहें और दूसरों के संपर्क में आने से बचें. खांसते या छींकते समय मुंह ढकें और हाथ साफ रखें. खासकर घर में बुजुर्ग या किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति है, तो उसके पास जाते समय ज्यादा सावधानी रखें.

    एच1एन1 के मामले बढ़ रहे हैं तो सावधानी जरूरी है, लेकिन इसे लेकर कोरोना जैसी स्थिति की आशंका से घबराने की जरूरत नहीं है. संक्रमण का फैलाव और उसकी गंभीरता लगातार निगरानी का विषय जरूर है.

  • मेनोपॉज से पहले शुरू होता है पेरिमेनोपॉज, शरीर में दिखते हैं ये संकेत, डॉक्टर से जानें

    महिलाओं के लाइफ में मेनोपॉज एक नेचुरली फिजिकल चेंज है, जिसमें लगातार 12 महीनों तक पीरियड्स नहीं आते. पर क्या आप जानते हैं कि मेनोपॉज से पहले महिलाओं को पेरिमेनोपॉज से भी गुजरना पड़ता है. बहुत कम इसके बारे में सवाल करते हैं या फिर इसकी जानकारी रखते हैं. आखिर ये क्या है और इसके संकेत क्या होते हैं इस पर टीवी9 ने डॉ. रुचि भंडारी (डायरेक्टर, ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी डिपार्टमेंट, यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल) से खास बातचीत की.

    एक्सपर्ट कहती हैं कि आमतौर पर मेनोपॉज से पहले शरीर में हार्मोनल बदलाव शुरू हो जाते हैं, जिन्हें पेरिमेनोपॉज कहा जाता है. इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन के स्तर में उतार-चढ़ाव होने लगता है, जिसके कारण पीरियड्स के पैटर्न और शरीर में कई बदलाव दिखाई दे सकते हैं.

    पीरियड्स का ठीक से न आना

    डॉक्टर ने बताया पेरिमेनोपॉज का सबसे सामान्य संकेत पीरियड्स में अनियमितता है. कभी पीरियड्स समय से पहले आ सकते हैं, तो कभी कई सप्ताह या महीनों का अंतर हो सकता है. ब्लीडिंग सामान्य से कम या अधिक भी हो सकती है. इसके अलावा अचानक गर्मी महसूस होना या हॉट फ्लैशेज, रात में पसीना आना, नींद में परेशानी, मूड में बदलाव, चिड़चिड़ापन, थकान और एकाग्रता में कमी जैसे लक्षण भी हो सकते हैं. कुछ महिलाओं को योनि में सूखापन, सेक्स के दौरान असहजता, त्वचा में बदलाव या वजन और शरीर की संरचना में परिवर्तन भी महसूस हो सकता है.

    यह समझना जरूरी है कि हर महिला में पेरिमेनोपॉज के लक्षण एक जैसे नहीं होते. कुछ महिलाओं में लक्षण हल्के होते हैं, जबकि कुछ में वे दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए इन्हें केवल उम्र का सामान्य असर मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है.

    35 से 40 की उम्र में प्रोएक्टिव हेल्थ मैनेजमेंट जरूरी

    डॉक्टर कहती हैं कि मिड-लाइफ में महिलाओं के लिए प्रोएक्टिव हेल्थ मैनेजमेंट बेहद महत्वपूर्ण है. संतुलित आहार, पर्याप्त प्रोटीन और कैल्शियम का सेवन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन और धूम्रपान व अत्यधिक शराब से बचाव स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं. इस उम्र में हड्डियों, हृदय स्वास्थ्य, वजन, ब्लड प्रेशर और अन्य जरूरी स्वास्थ्य मानकों की नियमित निगरानी भी महत्वपूर्ण हो जाती है.

    पेरिमेनोपॉज से जुड़े कई हार्मोनल मिथ्स भी आम हैं. हर हार्मोनल बदलाव का मतलब बीमारी नहीं होता और हर महिला को हार्मोन थेरेपी की जरूरत भी नहीं होती. उपचार का निर्णय लक्षणों, मेडिकल हिस्ट्री और व्यक्तिगत स्वास्थ्य जरूरतों के आधार पर डॉक्टर की सलाह से किया जाना चाहिए. इसी तरह, अनियमित पीरियड्स को हमेशा मेनोपॉज का संकेत मानना भी सही नहीं है, क्योंकि इसके अन्य कारण हो सकते हैं.

    अगर बहुत अधिक या असामान्य ब्लीडिंग हो, लंबे समय तक पीरियड्स न आने के बाद दोबारा ब्लीडिंग हो, या लक्षण बहुत अधिक परेशान कर रहे हों, तो डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है. सही जानकारी, समय पर जांच और स्वस्थ जीवन शैली के साथ पेरिमेनोपॉज और मेनोपॉज को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकता है.

  • मंदिर में परिक्रमा करते समय रखें इन बातों का ध्यान, किस देवता की कितनी प्रदक्षिणा शुभ मानी जाती हैं?

    मंदिर में पूजा-पाठ के साथ देवी-देवताओं की परिक्रमा को भी अत्यंत शुभ माना जाता है। आइए आपको बताते हैं कौन से देवता की कितनी परिक्रमाएं करनी चाहिए।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली।  मंदिर में दर्शन के बाद लोग भगवान की परिक्रमा जरूर करते हैं। किसी भी देवी-देवता की परिक्रमा को पूजा का ही एक चरण माना जाता है। परिक्रमा लगाने से पूजा का पूर्ण फल और ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है।

    ज्योतिष में परिक्रमा करने के कुछ नियम बताए गए हैं और उनका पालन जरूरी माना जाता है। हर एक देवी या देवता की परिक्रमा के कुछ नियम हैं। जहां कुछ देवताओं की एक बार परिक्रमा की जाती है, वहीं कुछ की 2 या 3 बार।

    यही नहीं कई देवी-देवताओं की 11 बार परिक्रमा करना भी शुभ माना जाता है। आइए जानें कि भगवान शिव से लेकर विष्णु और अन्य देवताओं की कितनी परिक्रमा करना शुभ माना जाता है और क्यों?

    गणपति की कितनी परिक्रमा शुभ

    मंदिर में गणपति की तीन बार परिक्रमा करने की सलाह दी जाती है। जब भी आप मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं आपको गणपति की पूजा के बाद 3 बार परिक्रमा जरूर करनी चाहिए। इससे उनका आशीर्वाद मिलता है। यदि आप गणपति के मूषक के कान में मनोकामना कहते हैं तो पूर्ति होती है।

    भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा

    भगवान शिव और माता पार्वती या फिर शिव परिवार की परिक्रमा करती हैं तो आपके लिए तीन परिक्रमाएं करनी चाहिए। वहीं आपको शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही करनी चाहिए। आपको शिव परिवार की हमेशा विषम संख्या में परिक्रमा करनी चाहिए।

    भगवान विष्णु की परिक्रमा के नियम

    जब आप मंदिर में विष्णु जी की परिक्रमा करें तो हमेशा चार परिक्रमा करनी चाहिए। विष्णु मंदिर में गर्भगृह के चारों ओर हमेशा चार बार परिक्रमा करनी चाहिए।

    हनुमान जी और शनि देव

    किसी भी मंदिर में पूजन के समय हनुमान जी की तीन और शनिदेव की सात परिक्रमाएं करनी चाहिए। हनुमान जी की परिक्रमा करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

    माता दुर्गा की कितनी परिक्रमाएं शुभ हैं?

    जब आप दुर्गा माता की परिक्रमा कर रहे हैं तो ध्यान रखें कि आप माता की चार परिक्रमाएं ही करें। माता दुर्गा के साथ अन्य देवियों की भी चार बार परिक्रमा करना ही शुभ माना जाता है।

    पीपल और बरगद की परिक्रमा के नियम

    जब हम किसी पेड़ की परिक्रमा की बात करते हैं, तो आमतौर पर पीपल और बरगद के पेड़ों की सात बार परिक्रमाएं करने की सलाह दी जाती है।

    देवी-देवताओं की परिक्रमा के नियम

    • आप जब भी किसी भी देवी या देवता की परिक्रमा करते हैं आपको ध्यान रखना है कई हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में ही परिक्रमा करें।
    • आप जिस स्थान से परिक्रमा शुरू करें एक चक्कर उसी स्थान पर पूर्ण माना जाता है।
    • जिन देवी-देवताओं की जितनी संख्या को उचित माना जाता है उतनी ही परिक्रमाएं करें।
    • भूलकर भी मंदिर में उल्टी परिक्रमा न करें।

    यदि आप मंदिर में दर्शन के साथ सही नियमों के अनुसार परिक्रमा करते हैं तो आपको इसके पूर्ण फल मिलते हैं और ईश्वर का आशीर्वाद भी पाने में मदद मिलती है।

  • हथेली की भाग्य रेखा पर शुभ चिन्ह बदलेंगे आपकी किस्मत, 30 की उम्र के बाद मिलेगी सफलता

    नई दिल्ली। हस्तरेखा शास्त्र में हथेली की रेखाओं और चिन्हों को व्यक्ति के जीवन से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि हथेली की भाग्य रेखा व्यक्ति के करियर, सफलता और जीवन में आने वाले बदलावों के संकेत देती है। हस्तरेखा शास्‍त्र के अनुसार, भाग्य रेखा में कुछ विशेष बदलाव या शुभ चिन्ह दिखाई देने पर यह माना जाता है कि व्यक्ति को जीवन के शुरुआती संघर्षों के बाद आगे चलकर बड़ी सफलता मिल सकती है। खासतौर पर उम्र के 30वें पड़ाव पर पहुंचने के बाद कुछ लोगों की किस्‍मत तक पलट जाती है और चीजें सकारात्‍मक होने लग जाती हैं। चलिए जानते हैं कि हथेली की भाग्‍य रेखा पर वो कौन से शुभ चिन्‍ह होते हैं, जो जीवन में अच्‍छे बदलाव ला सकते हैं।

    भाग्य रेखा और उम्र का संबंध
    हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार हथेली के बीच से गुजरने वाली भाग्य रेखा जीवन में करियर और उपलब्धियों से जुड़ी मानी जाती है। माना जाता है कि भाग्य रेखा का हथेली की अन्य रेखाओं से संबंध व्यक्ति के जीवन के अलग-अलग पड़ावों को दर्शाता है।

    जब भाग्य रेखा मस्तिष्क रेखा को पार करती है, तो इसे कई हस्तरेखा मान्यताओं में लगभग 30 से 35 वर्ष की उम्र के समय से जोड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस उम्र के बाद व्यक्ति अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर सफलता की ओर तेजी से बढ़ सकता है।

    हस्तरेखा शास्त्र में यदि भाग्य रेखा उम्र बढ़ने के साथ अधिक गहरी और स्पष्ट होती दिखाई दे, तो इसे शुभ संकेत माना जाता है। मान्यता है कि ऐसे लोगों को जीवन में धीरे-धीरे सफलता मिलती है और वे अपने अनुभवों के बल पर बेहतर मुकाम हासिल करते हैं।

    कई बार व्यक्ति को कम उम्र में संघर्षों का सामना करना पड़ता है, लेकिन समय के साथ उसकी मेहनत और सही फैसले उसे आगे बढ़ने में मदद करते हैं।

    हथेली पर त्रिशूल का निशान
    हस्तरेखा शास्त्र में त्रिशूल का चिन्ह शुभ माना जाता है। यदि यह निशान भाग्य रेखा के पास या शनि पर्वत के क्षेत्र में दिखाई दे, तो इसे सफलता और उन्नति का संकेत माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा चिन्ह व्यक्ति को 30 से 35 वर्ष की उम्र के बाद करियर में अच्छे अवसर, पद-प्रतिष्ठा और आर्थिक प्रगति का संकेत दे सकता है।

    भाग्य रेखा के पास मछली का चिन्ह
    हथेली पर मछली का चिन्ह भी हस्तरेखा शास्त्र में शुभ माना जाता है। यदि भाग्य रेखा के आसपास मछली जैसा स्पष्ट आकार बनता है, तो इसे भाग्योदय, सम्मान और नए अवसरों से जोड़कर देखा जाता है।

    अत: भाग्य रेखा पर त्रिशूल, मछली या ऊपर उठती शाखाओं जैसे चिन्हों को हस्तरेखा शास्त्र में शुभ माना गया है।

  • ‘ॐ शांतिः शांतिः शांतिः’… क्या आप जानते हैं 3 बार उच्चारण करने के पीछे का असल रहस्य?

    ॐ असतो मा सद्गमय।

    तमसो मा ज्योतिर्गमय।

    मृत्योर्मा अमृतं गमय।

    ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

    बृहदारण्यक उपनिषद (1.3.28) का यह मंत्र हम सबने कभी न कभी जरूर सुना है। स्कूलों में सुबह की प्रार्थना में यह मंत्र जरूर पढ़ा जाता था। इसका सीधा सा मतलब बहुत ही खूबसूरत है कि “हे ईश्वर! हमें झूठ से सच की ओर, अज्ञान के अंधेरे से ज्ञान के उजाले की ओर, और मृत्यु के डर से अमरता की ओर ले चलो।”

    लेकिन, इस मंत्र के अंत में ‘शांति’ शब्द का इस्तेमाल तीन बार क्यों किया गया है? सिर्फ इसी मंत्र में नहीं, सनातन धर्म के लगभग हर वैदिक मंत्र या पूजा-पाठ के अंत में ‘ॐ शांतिः शांतिः शांतिः’ जरूर बोला जाता है। क्या यह महज एक संयोग है या इसके पीछे कोई विज्ञान है?

    हमारे शास्त्रों में हर नियम के पीछे एक बहुत ही तार्किक और गहरा कारण छुपा हुआ है। हिंदू धर्मग्रंथों और वेदांत दर्शन के अनुसार, मनुष्य के जीवन में मुख्य रूप से तीन तरह के दुख या बाधाएं आती हैं। इन्हीं तीन तापों (कष्टों) से मुक्ति पाने के लिए शांति का तीन बार उच्चारण किया जाता है:

    • पहला ‘शांति’:
      मंत्र के अंत में पहली बार शांति कहने का मतलब होता है हमारे अंदर की अशांति को खत्म करने के लिए। हमारे मन का डर, क्रोध, लालच, चिंता और शारीरिक बीमारियां यह सब इसी शांति में आते हैं। जब हम पहली बार शांति बोलते हैं, तो हम प्रार्थना करते हैं कि हमारा अपना मन और शरीर पूरी तरह शांत और स्वस्थ रहे।
    • दूसरा ‘शांति’:
      यह हमारे आस-पास के माहौल से जुड़ी परेशानियों के लिए है। जैसे कोई दुश्मन, जंगली जानवर या किसी दूसरे इंसान से मिलने वाला दुख। दूसरी बार शांति बोलने का मतलब है कि हमारे आस-पास के सभी जीव और लोग शांत रहें।
    • तीसरा ‘शांति’:
      हम तीसरी बार शांति उन दैवीय या प्राकृतिक आपदाओं के लिए बोलते हैं जिन पर हमारा कोई बस नहीं चलता। जैसे भूकंप, बाढ़, तूफान या महामारी। तीसरी बार अपनी आवाज को धीमा कर शांति बोलकर हम ब्रह्मांड और अदृश्य शक्तियों से प्रार्थना करते हैं कि प्रकृति में संतुलन बनाते हैं।

    इस तरह, तीन बार शांति बोलने की यह परंपरा केवल एक रस्म नहीं है। यह खुद को, अपने समाज को और पूरी प्रकृति को एक साथ तालमेल में लाने का एक शानदार तरीका है।

  • ऐसे लोगों की मदद करने पर खुद बर्बादी के रास्ते पर आ जाता है इंसान, जानिए क्या कहती है चाणक्य नीति?

    आचार्य चाणक्य को भारत के सबसे महान विद्वानों और कूटनीतिज्ञों में गिना जाता है. उनकी कही बातें आज भी इंसानी जिंदगी में बिल्कुल सही बैठती हैं. चाणक्य जी का मानना था कि इंसान को हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए. मदद करना एक बहुत अच्छा गुण है.

    लेकिन कई बार बिना सोचे समझे की गई मदद खुद हमारे लिए जी का जंजाल बन जाती है. चाणक्य नीति में ऐसे 3 तरह के लोगों का जिक्र किया गया है, जिनकी मदद करने पर इंसान खुद मुसीबत में फंस जाता है. अगर आप भी इन लोगों का भला करने की सोच रहे हैं, तो रुक जाइए. वरना आपकी अच्छाई ही आपको कंगाली और बर्बादी के मोड़ पर खड़ा कर सकती है.

    दुष्ट और बुरे स्वभाव की स्त्री या पुरुष
    चाणक्य नीति के अनुसार, जो इंसान दिल का काला और बुरे स्वभाव का होता है, उससे हमेशा दूरी बनाकर रखनी चाहिए. ऐसे लोगों की मदद करना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है.

    दुष्ट स्वभाव के लोग किसी के सगे नहीं होते. आप चाहे उनके लिए कितना भी अच्छा क्यों न कर लें, वे सही मौका मिलते ही आपको नुकसान पहुंचाने से पीछे नहीं हटेंगे.

    ऐसे लोगों को सहारा देने से आपकी खुद की सामाजिक इज्जत और छवि पर बुरा असर पड़ता है. इसलिए ऐसे स्वभाव वाले लोगों के मामलों से खुद को दूर रखना ही समझदारी है.

    हमेशा बिना वजह दुखी रहने वाले लोग
    दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बिना किसी बड़ी वजह के हमेशा रोते रहते हैं. उनके पास सब कुछ होते हुए भी वे अपनी किस्मत और परिस्थितियों को कोसते रहते हैं.

    चाणक्य जी कहते हैं कि ऐसे नकारात्मक सोच वाले लोगों की मदद करने से बचना चाहिए. ऐसे लोग कभी भी अपनी जिंदगी में खुश या संतुष्ट नहीं हो सकते.

    अगर आप उनकी मदद करेंगे, तो उनकी नकारात्मक ऊर्जा आपके जीवन पर भी असर डालने लगेगी. धीरे धीरे आप भी मानसिक तनाव के शिकार हो जाएंगे और अपनी खुशियां खो बैठेंगे.

    मूर्ख और बिना दिमाग वाले इंसान को उपदेश
    किसी मूर्ख व्यक्ति को ज्ञान देना या उसकी मदद करना सबसे बेवकूफी भरा काम माना जाता है. जो इंसान अपनी भलाई बुराई नहीं समझता, उसे कोई बात समझाना पूरी तरह से समय की बर्बादी है.

    जब आप किसी मूर्ख इंसान को सही रास्ता दिखाने की कोशिश करते हैं, तो वह आपकी बात को गलत समझ बैठता है. ऐसे लोग अक्सर मदद करने वाले को ही अपना दुश्मन मान लेते हैं. इनसे बहस करने या इनकी मदद करने के चक्कर में आपका मानसिक सुकून पूरी तरह से छिन सकता है.

    मदद करते वक्त इन बातों का रखें ध्यान
    मदद करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप खुद को जोखिम में डाल लें. आचार्य चाणक्य कहते हैं कि दया भाव रखना अच्छी बात है, लेकिन अपनी समझ का इस्तेमाल करना भी उतना ही जरूरी है.

    किसी की भी मदद करने से पहले उसकी नीयत और व्यवहार को अच्छे से परख लें. अगर आपको लगता है कि सामने वाला इंसान आपके भले का गलत फायदा उठा सकता है, तो तुरंत पीछे हट जाएं. अपनी सीमाएं तय करना सीखें ताकि आपकी अच्छाई का कोई नाजायज फायदा न उठा सके.

    सही इंसान की मदद से बदलती है किस्मत
    जब आप किसी जरूरतमंद, ईमानदार और सही इंसान की मदद करते हैं, तो उसका फल आपको जरूर मिलता है. सही इंसान की मदद करने से मन को शांति मिलती है और समाज में आपका मान सम्मान बढ़ता है.

    चाणक्य नीति हमें यही सिखाती है कि हमारी दयालुता का सही जगह इस्तेमाल होना चाहिए. जब आप सही जगह और सही इंसान पर अपनी ऊर्जा और पैसा लगाते हैं, तभी आपके घर में बरकत आती है. इसलिए हमेशा अपनी आंखें खुली रखें और सही गलत का फर्क समझकर ही हाथ आगे बढ़ाएं.

    
    
  • अंतिम संस्कार के समय मृतक के मुंह में सोने का टुकड़ा रखने की परंपरा क्यों है? गरुड़ पुराण में छिपा है रहस्य

    हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के कई नियम बनाए गए हैं और उनका पालन जरूरी माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति इन नियमों का पालन करता है तो मृतक की आत्मा को मुक्ति मिलने के साथ उनके वंशजों के जीवन में भी खुशहाली आती है।

    गरुड़ पुराण में भी कई बातों का जिक्र किया गया है और उसके अनुसार ही मृत व्यक्ति को मुखाग्नि दी जाती है। जिस प्रकार मृतक को स्नान कराने के बाद नए कपड़े पहनाए जाते हैं और यदि कोई सुहागिन स्त्री का अंतिम संस्कार किया जाता है तब उसका सोलह श्रृंगार किया जाता है।

    यही नहीं मृतक के मुख में तुलसी और गंगाजल रखने की परंपरा का पालन भी सदियों से किया जा रहा है, लेकिन क्या आप जानते हैं एक और रस्म के बारे में जिसमें मृत व्यक्ति के मुख में सोने का टुकड़ा रहा जाता है। आइए आपको बताते हैं मृतक के मुख में सोने का टुकड़ा रखने के पीछे की मान्यता के बारे में क्या कहता है गरुड़ पुराण?

    मृतक के मुख में सोने के टुकड़ा क्यों रखते हैं?

    मृतक के मुंह में सोने का टुकड़ा उसे चिता पर लेटाने से पहले रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोना एक पवित्र और शुभ धातु मानी जाती है इसलिए, कहा जाता है कि मृतक के मुख में सोना रखने से आत्मा शुद्ध होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसके परिवार के लोग ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। ऐसे में मुख में सोना रखने का एक मात्र उद्देश्य मृतक को सांसारिक मोह-माया से मुक्ति दिलाना होता है। सोना एक ऐसी धातु है ही मृत आत्मा के लिए स्वर्ग के द्वार खोलती है, इसी वजह से यह मृत व्यक्ति के लिए अंतिम यात्रा को आसान बनाती है।

    गरुड़ पुराण में लिखी है यह बात

    यदि हम गरुड़ पुराण की मानें तो हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के समय मुख में तुलसी, गंगाजल और सोना रखने से पवित्रता बनी रहती है।

    मृतक के शरीर की अशुध्दियां दूर हो सकती हैं और स्वर्ण को एक ऐसी धातु माना जाता है जो कि अग्नि में तपने के बाद भी अपनी पवित्रता नहीं खोता है, इसलिए मृतक के मुख में सोना धातु का एक छोटा सा टुकड़ा जरूर रखा जाता है।

    इससे मृत आत्मा को सम्मान भी मिलता है। इसके साथ ही, मृत्यु के समय भौतिक शरीर पंचतत्वों में विलीन होते समय अशुद्ध न हो जाए, इसलिए सोना मुख में रखा जाता है।

    मृतक को पापों से मुक्ति मिलती है

    यदि मृत व्यक्ति के मुख में सोने का एक टुकड़ा रखा जाता है तो उसे जीवन पर्यन्त किए गए किसी भी पाप से मुक्ति मिल सकती है और इसे मोक्ष पाने का माध्यम माना जाता है। यदि नहीं ऐसा करने से यम का भय भी दूर होता है और आत्मा की आगे की यात्रा आसान हो जाती है।

    गरुड़ पुराण में बताया गया है कि व्यक्ति के मुख में रखा हुआ सोने का एक छोटा सा टुकड़ा मोक्ष दिलाने और प्रेत योनि से बचाने में मदद करता है।

    मृतक के मुख में सोने का टुकड़ा रखना सिर्फ एक रस्म नहीं है बल्कि आत्मा के लिए मुक्ति का द्वार भी खोलने में मदद करती है।

  • रात में बाहर न टांगें कपड़े! जानिए क्यों वास्तु और साइंस दोनों मानते हैं इसे बड़ा नुकसान

    अक्सर हम लोग अलस में आकर रात को धुले कपड़े बाहर बालकनी या छत पर सुखाने डाल देते हैं. या फिर दिन के सूखे कपड़े भी रात भर बाहर रस्सी पर ही लटके छोड़ देते हैं. अगर आप भी ऐसा करते हैं, तो जरा संभल जाइए. बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते हैं कि शाम ढलते ही कपड़े अंदर ले आने चाहिए. वास्तु शास्त्र में रात को कपड़े बाहर छोड़ना सही नहीं माना जाता. कहते हैं इससे घर में किचकिच और निगेटिव वाइब्स आती हैं. सिर्फ पूजा-पाठ या वास्तु ही नहीं, साइंस के हिसाब से भी रात में कपड़े सुखाना सेहत के लिए नुकसानदायक है.

    घर में नेगेटिविटी बढ़ने का डर
    वास्तु के हिसाब से दिन और रात के माहौल में बहुत फर्क होता है. रात के समय खुली हवा में गीले कपड़े छोड़ने से उनमें निगेटिव एनर्जी समाने लगती है. सिर्फ गीले ही नहीं, सूखे कपड़ों पर भी रात की ओस और हवा का असर पड़ता है. यही वजह है कि रात भर बाहर टंगे कपड़े पहनने से घर में भारीपन महसूस होता है और बात-बात पर तनाव या चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है.

    दाद, खुजली और स्किन एलर्जी की आफत
    अब अगर साइंस की बात करें, तो रात के वक्त हवा में नमी यानी ओस बहुत ज्यादा होती है. इससे कपड़े रात भर में पूरी तरह सूख ही नहीं पाते.

    कपड़ों में सीलन और नमी बनी रहने की वजह से उनमें फंगस और कीटाणु पनपने लगते हैं. जब आप ये कपड़े पहनते हैं, तो दाद, खाज, खुजली और स्किन एलर्जी जैसी परेशानियां घेर लेती हैं.

    धूप की ताकत और फायदे
    कपड़ों को हमेशा दिन में सूरज की कड़क धूप और ताजी हवा में ही सुखाना सबसे बेहतर होता है. धूप कपड़ों की सीलन को पल भर में खत्म कर देती है.

    सूरज की किरणें एक तरह से नेचुरल सैनिटाइजर की तरह काम करती हैं, जो कपड़ों के सारे जर्म्स और बैक्टीरिया को मार देती हैं. धूप में सूखे कपड़ों से कोई अजीब सी बदबू भी नहीं आती और वे एकदम फ्रेश रहते हैं.

    शाम होने से पहले समेट लें कपड़े
    अपनी आदत में थोड़ा बदलाव करें और सुबह-सुबह कपड़े धोने की कोशिश करें ताकि दोपहर तक वे धूप में अच्छे से सूख जाएं.

    जैसे ही सूरज ढलने लगे, यानी शाम होने से पहले सारे कपड़े बाहर से उठाकर घर के अंदर रख लें. अगर कोई कपड़ा थोड़ा-बहुत गीला रह भी जाए, तो उसे रात में कमरे में पंखे के नीचे सुखा लें, लेकिन बाहर बिल्कुल न छोड़ें.

    बुजुर्गों की बात में छुपा है बड़ा लॉजिक
    हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग जो भी नियम-कायदे बनाते हैं, उनके पीछे वास्तु के साथ-साथ सेहत से जुड़ा लॉजिक भी होता है. रात में कपड़े बाहर न सुखाना कोई अंधविश्वास नहीं है.

    यह आपके परिवार की अच्छी सेहत और घर में पॉजिटिव माहौल बनाए रखने का एक आसान तरीका है. इसलिए आज से ही अपनी आदत बदलें और शाम होने से पहले कपड़े अंदर लाने का नियम बना लें.

    
    
  • जीवन में मान-सम्मान बढ़ाना है तो आचार्य चाणक्य की ये 6 बातें गांठ बांध लें

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमारी आदतें ही होती हैं, जो हमारे बारे में दूसरों के मन में जगह बनाती भी हैं और मिटाती भी हैं। यदि आप भी चाहते हैं कि लोग आपकी कद्र करें और आपको सम्मान दें, तो उसके लिए अपनी आदतों को सुधारें और आज ही चाणक्य नीति में बताई गईं इन छह आदतों को अपनाएं। यदि आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ अच्छी आदतों को शामिल कर लेंगे, तो आपको भी लोग इज्जत की नजरों से देखना शुरू कर देंगे। तो चलिए जानते हैं इन 6 आदतों के बारे में।

    समय का सम्मान करें

    आपने इस बारे में तो सुना ही होगा कि जो लोग समय का सम्मान नहीं करते हैं, समय उनका सम्मान नहीं करता है। इसलिए सबसे पहले अपनी आदत में इस बात को शामिल करें कि आज का काम आज ही निपटाएं। कल पर काम छोड़ने वाले आलस्य को त्याग दें। जो लोग इस आदत को अपनाते हैं, लोग उन पर भरोसा करते हैं और यहीं से उनका सम्मान भी बढ़ता है।

    क्रोध पर रखें नियंत्रण

    आप में लाख अच्‍छाई हो, मगर गुस्सा पल भर में आपके सारे अच्‍छे काम पर पानी फेर सकता है। गुस्सा इंसान की समझने और सोचने की क्षमता को प्रभावित करता है। साथ ही यह भी जान लें कि आप जो काम प्‍यार और मोहब्‍बत से किसी से करा सकते हैं, वही काम कितना भी गस्‍सा कर लें, नहीं करा सकते। क्रोध में कही गई एक छोटी-सी बात भी रिश्तों को खराब कर सकती है। इसलिए किसी भी परिस्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत रहने की कोशिश करें। जो व्यक्ति मुश्किल समय में भी खुद पर नियंत्रण रखता है, लोग उसकी तरफ ज्‍यादा आकर्षित होते हैं।

    मीठी और स्पष्ट वाणी बोलें

    आपकी भाषा आपके व्यक्तित्व की पहचान होती है। इसलिए हमेशा बोलते वक्‍त अच्‍छे शब्‍दों का ही प्रयोग करें। सरल, स्पष्ट और विनम्र शब्दों से आप किसी का भी दिल जीत सकते हैं। किसी का अपमान करने या अहंकार से बात करने से लोग आपसे दूरी बना लेते हैं। वहीं, मीठी वाणी और सम्मानजनक व्यवहार लोगों के दिल में आपके लिए जगह बनाता है।

    ज्ञान से कभी जी न चुराएं

    चाणक्य नीति में ज्ञान को बहुत महत्‍व दिया गया है। कभी ऐसा न सोचें कि अब जीवन में आपने सब कुछ सीख लिया है। जिस दिन कोई व्‍यक्ति सोच लेता है कि उसे सब कुछ आता है, बस तब ही उसका पतन शुरू हो जाता है। जीवन में हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश करें। किताबें पढ़ें, अनुभवी लोगों से सीखें और अपनी गलतियों से भी सबक लें।

    सही संगति चुनें

    आपका व्‍यक्तित्‍व बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसी की संगत में है। अगर आप अच्‍छे लोगों की संगत में हैं, तो आपके सोचने और कर्म करने का तरीका वैसा ही होगा। वहीं आप अगर बुरे लोगों की संगती में होंगे, तो आपके आचरण भी वैसे होंगे। इसलिए ऐसे लोगों की संगति चुनें जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें।

    अनुशासन और संयम अपनाएं

    जीवन में अनुशासन व्यक्ति को मजबूत और जिम्मेदार बनाता है। अपने खान-पान, खर्च, इच्छाओं और दैनिक कामों में संतुलन रखें। हर इच्छा को तुरंत पूरा करने की कोशिश न करें। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं और आदतों पर नियंत्रण रखना सीख जाता है, वह कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रख सकता है।