ॐ असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥
बृहदारण्यक उपनिषद (1.3.28) का यह मंत्र हम सबने कभी न कभी जरूर सुना है। स्कूलों में सुबह की प्रार्थना में यह मंत्र जरूर पढ़ा जाता था। इसका सीधा सा मतलब बहुत ही खूबसूरत है कि “हे ईश्वर! हमें झूठ से सच की ओर, अज्ञान के अंधेरे से ज्ञान के उजाले की ओर, और मृत्यु के डर से अमरता की ओर ले चलो।”

लेकिन, इस मंत्र के अंत में ‘शांति’ शब्द का इस्तेमाल तीन बार क्यों किया गया है? सिर्फ इसी मंत्र में नहीं, सनातन धर्म के लगभग हर वैदिक मंत्र या पूजा-पाठ के अंत में ‘ॐ शांतिः शांतिः शांतिः’ जरूर बोला जाता है। क्या यह महज एक संयोग है या इसके पीछे कोई विज्ञान है?
हमारे शास्त्रों में हर नियम के पीछे एक बहुत ही तार्किक और गहरा कारण छुपा हुआ है। हिंदू धर्मग्रंथों और वेदांत दर्शन के अनुसार, मनुष्य के जीवन में मुख्य रूप से तीन तरह के दुख या बाधाएं आती हैं। इन्हीं तीन तापों (कष्टों) से मुक्ति पाने के लिए शांति का तीन बार उच्चारण किया जाता है:
- पहला ‘शांति’:
मंत्र के अंत में पहली बार शांति कहने का मतलब होता है हमारे अंदर की अशांति को खत्म करने के लिए। हमारे मन का डर, क्रोध, लालच, चिंता और शारीरिक बीमारियां यह सब इसी शांति में आते हैं। जब हम पहली बार शांति बोलते हैं, तो हम प्रार्थना करते हैं कि हमारा अपना मन और शरीर पूरी तरह शांत और स्वस्थ रहे। - दूसरा ‘शांति’:
यह हमारे आस-पास के माहौल से जुड़ी परेशानियों के लिए है। जैसे कोई दुश्मन, जंगली जानवर या किसी दूसरे इंसान से मिलने वाला दुख। दूसरी बार शांति बोलने का मतलब है कि हमारे आस-पास के सभी जीव और लोग शांत रहें। - तीसरा ‘शांति’:
हम तीसरी बार शांति उन दैवीय या प्राकृतिक आपदाओं के लिए बोलते हैं जिन पर हमारा कोई बस नहीं चलता। जैसे भूकंप, बाढ़, तूफान या महामारी। तीसरी बार अपनी आवाज को धीमा कर शांति बोलकर हम ब्रह्मांड और अदृश्य शक्तियों से प्रार्थना करते हैं कि प्रकृति में संतुलन बनाते हैं।
इस तरह, तीन बार शांति बोलने की यह परंपरा केवल एक रस्म नहीं है। यह खुद को, अपने समाज को और पूरी प्रकृति को एक साथ तालमेल में लाने का एक शानदार तरीका है।
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