अलीगढ़: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से पति की हत्या के एक मामले में अदालत का महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। मामले में पत्नी और उसके प्रेमी को दोषी करार देते हुए अदालत ने दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इसके साथ ही दोनों दोषियों पर 35-35 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।

इस मामले में सबसे भावुक कर देने वाला पक्ष मृतक के मासूम बेटे की गवाही रही। सुनवाई के दौरान जब जज ने बच्चे से पूछा कि वह क्या चाहता है, तो उसने कथित तौर पर कहा, “जज अंकल! मम्मी ने पापा को मारा है, इन्हें फांसी दे दो।” बच्चे की बात सुनकर कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया।
पत्नी और प्रेमी पर लगा पति की हत्या का आरोप
मामला 10 जुलाई 2026 की सुबह का बताया गया है। खबर के मुताबिक, विजय सिंह अपने भाई सुरेश के घर के बाहर मौजूद थे। इसी दौरान सुरेश की पत्नी बीना के दरवाजे पर खड़े होने की बात सामने आई।
आरोप है कि इसी दौरान बीना का प्रेमी मनोज वहां पहुंचा। दोनों पर आरोप था कि उन्होंने पहले से सुरेश की हत्या की साजिश रची थी। घटना के दौरान मनोज ने कथित तौर पर सुरेश पर गोली चला दी, जिससे उसकी मौत हो गई।
हत्या के बाद दोनों हो गए थे फरार
घटना के बाद बीना और मनोज के मौके से फरार होने की बात सामने आई। पुलिस जांच के दौरान मामले में कई साक्ष्य जुटाए गए। अदालत में अभियोजन पक्ष की ओर से गवाहों के बयान के साथ पोस्टमार्टम रिपोर्ट, एफएसएल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्य भी पेश किए गए।
मासूम बेटे की गवाही बनी अहम कड़ी
इस केस में मृतक के 15 वर्षीय बेटे नितेश की गवाही को महत्वपूर्ण माना गया। उसने अदालत में घटना से जुड़ी जानकारी विस्तार से बताई। अभियोजन पक्ष की ओर से कुल आठ गवाह पेश किए गए, जिनमें मृतक के परिवार के सदस्य और अन्य संबंधित गवाह शामिल थे।
अदालत के सामने पेश किए गए सबूतों और गवाहियों पर विचार करने के बाद दोनों आरोपियों को दोषी माना गया।
फैसला सुनते ही रोने लगी बीना
जब अदालत ने बीना और मनोज को उम्रकैद की सजा सुनाई, तो बीना के भावुक होकर रोने की बात सामने आई। वहीं कोर्ट में मौजूद बच्चों का अपनी मां की ओर देखते रहना भी चर्चा का विषय बना।
अदालत ने दोनों दोषियों को उम्रकैद के साथ 35-35 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। मामले में मासूम बच्चों की गवाही ने इस पूरे घटनाक्रम को और भी भावुक बना दिया।
नोट: यह लेख आपके द्वारा भेजी गई समाचार-कतरन में दी गई जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। आरोपों और अदालती फैसले से जुड़े अंतिम तथ्यों के लिए आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड को प्राथमिक स्रोत माना जाना चाहिए।







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