नेपाल जैसी प्राकृतिक त्रासदी और हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से बढ़ते खतरे के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी एक ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जो झील की हर हलचल पर नजर रखेगी। झील के पानी में असामान्य बदलाव होते ही फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम सक्रिय हो जाएगा और संभावित बाढ़ की स्थिति में यह भी बता सकेगा कि पानी कितनी तेजी से नीचे की ओर बढ़ रहा है और प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने में कितना समय लग सकता है।
हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से होने वाली अचानक बाढ़, जिसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) कहा जाता है, का खतरा लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। इसे देखते हुए आईआईटी मंडी एक स्टार्टअप के लिए अत्याधुनिक फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित कर रहा है। यह सिस्टम अभी परीक्षण और विकास के चरण में है।
दूरदृष्टि नाम के इस सिस्टम को ग्लेशियर झील के आउटलेट, मोरेन से बने बांध वाले हिस्से या संवेदनशील डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के पास स्थापित किया जा सकता है। यह सौर ऊर्जा से संचालित एक स्वायत्त निगरानी इकाई होगी, जो लगातार जलस्तर, पानी के बहाव की गति और आसपास की परिस्थितियों पर नजर रखेगी। सिस्टम में बिना पानी के सीधे संपर्क में आए जलस्तर मापने के लिए रडार आधारित तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। वहीं, डॉप्लर रडार के माध्यम से पानी की सतह के बहाव की गति पर नजर रखी जाएगी। इसके साथ एआई आधारित ऑप्टिकल कैमरा भी लगाया जाएगा, जो असामान्य गतिविधियों की फोटो और वीडियो रिकॉर्ड कर सकेगा।
यदि जलस्तर में अचानक तेजी से बढ़ोतरी या गिरावट होती है। पानी के बहाव की गति असामान्य रूप से बढ़ती है। मलबा बहने लगता है या झील के आउटलेट पर रुकावट जैसी स्थिति बनती है तो सिस्टम उच्च आवृत्ति पर निगरानी शुरू कर देगा। ऐसी स्थिति में कैमरे भी सक्रिय होकर फोटो और वीडियो उपलब्ध कराएंगे, जिससे कंट्रोल सेंटर से वास्तविक स्थिति की पुष्टि की जा सके। इस तकनीक में एआई की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। एआई फोटो और वीडियो का विश्लेषण कर यह समझने की कोशिश करेगा कि जलस्तर में बदलाव किसी सामान्य कारण, जैसे तेज हवा या लहरों की वजह से हुआ है या वास्तव में कोई गंभीर खतरा पैदा हुआ है। इससे केवल किसी एक सेंसर की गलत रीडिंग के कारण अनावश्यक चेतावनी जारी होने की संभावना भी कम होगी।
वास्तविक खतरे की पुष्टि होने पर फ्लड मॉडल सक्रिय होगा
वास्तविक खतरे की पुष्टि होने पर फ्लड मॉडल सक्रिय होगा। पानी की गहराई, जलस्तर और बहाव की गति से जुड़ी जानकारी के आधार पर यह अनुमान लगाया जाएगा कि बाढ़ का पानी नीचे बसे गांवों या अन्य क्षेत्रों तक कितनी देर में पहुंच सकता है और उसका संभावित प्रभाव कितना हो सकता है। सिस्टम में 4जी/एलटीई, लोरा और वीसेट सहित कई संचार विकल्प उपलब्ध होंगे। इससे दूरदराज के हिमालयी क्षेत्रों में भी निगरानी संभव होगी, जहां सामान्य संचार सुविधाएं विश्वसनीय नहीं होतीं। सिस्टम में डेटा को स्थानीय स्तर पर सुरक्षित रखने की सुविधा भी होगी। खतरे की स्थिति में सिस्टम रियल टाइम जानकारी कंट्रोल सेंटर तक भेजेगा और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को अलर्ट जारी किया जा सकेगा। जरूरत पड़ने पर डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में सायरन के माध्यम से स्थानीय लोगों को चेतावनी भी दी जा सकेगी। इससे प्रशासन को पानी पहुंचने से पहले जरूरी कार्रवाई करने और लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का समय मिल सकता है। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसी आपदाओं में जनहानि को कम करना है। शोधकर्ताओं के अनुसार, सिस्टम की खासियत यह है कि यह बिना सीधे पानी के संपर्क में आए काम करेगा। सौर ऊर्जा से संचालित होने और मौसमरोधी संरचना के कारण इसे अधिक ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में भी लगाया जा सकेगा, जहां पारंपरिक सेंसरों का रखरखाव मुश्किल होता है और अत्यधिक बहाव के दौरान उनके क्षतिग्रस्त होने का खतरा रहता है।
कटौला में डेढ़ साल से हो रही टेस्टिंग
आईआईटी मंडी के समन्वय में विकसित हो रहे इस सिस्टम की टेस्टिंग मंडी की कटौला में करीब डेढ़ साल से की जा रही है। परीक्षण में अब तक अच्छे नतीजे मिले हैं। अगले दो से तीन महीनों में सिस्टम को और विकसित करने का लक्ष्य है। उम्मीद है कि अगले मानसून तक यह तकनीक धरातल पर होगी।– डॉ. विवेक गुप्ता, सहायक प्रोफेसर, जलवायु परिवर्तन एवं आपदा प्रबंधन केंद्र, आईआईटी मंडी
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