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  • मंदिर में परिक्रमा करते समय रखें इन बातों का ध्यान, किस देवता की कितनी प्रदक्षिणा शुभ मानी जाती हैं?

    मंदिर में पूजा-पाठ के साथ देवी-देवताओं की परिक्रमा को भी अत्यंत शुभ माना जाता है। आइए आपको बताते हैं कौन से देवता की कितनी परिक्रमाएं करनी चाहिए।

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली।  मंदिर में दर्शन के बाद लोग भगवान की परिक्रमा जरूर करते हैं। किसी भी देवी-देवता की परिक्रमा को पूजा का ही एक चरण माना जाता है। परिक्रमा लगाने से पूजा का पूर्ण फल और ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है।

    ज्योतिष में परिक्रमा करने के कुछ नियम बताए गए हैं और उनका पालन जरूरी माना जाता है। हर एक देवी या देवता की परिक्रमा के कुछ नियम हैं। जहां कुछ देवताओं की एक बार परिक्रमा की जाती है, वहीं कुछ की 2 या 3 बार।

    यही नहीं कई देवी-देवताओं की 11 बार परिक्रमा करना भी शुभ माना जाता है। आइए जानें कि भगवान शिव से लेकर विष्णु और अन्य देवताओं की कितनी परिक्रमा करना शुभ माना जाता है और क्यों?

    गणपति की कितनी परिक्रमा शुभ

    मंदिर में गणपति की तीन बार परिक्रमा करने की सलाह दी जाती है। जब भी आप मंदिर दर्शन के लिए जाते हैं आपको गणपति की पूजा के बाद 3 बार परिक्रमा जरूर करनी चाहिए। इससे उनका आशीर्वाद मिलता है। यदि आप गणपति के मूषक के कान में मनोकामना कहते हैं तो पूर्ति होती है।

    भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा

    भगवान शिव और माता पार्वती या फिर शिव परिवार की परिक्रमा करती हैं तो आपके लिए तीन परिक्रमाएं करनी चाहिए। वहीं आपको शिवलिंग की आधी परिक्रमा ही करनी चाहिए। आपको शिव परिवार की हमेशा विषम संख्या में परिक्रमा करनी चाहिए।

    भगवान विष्णु की परिक्रमा के नियम

    जब आप मंदिर में विष्णु जी की परिक्रमा करें तो हमेशा चार परिक्रमा करनी चाहिए। विष्णु मंदिर में गर्भगृह के चारों ओर हमेशा चार बार परिक्रमा करनी चाहिए।

    हनुमान जी और शनि देव

    किसी भी मंदिर में पूजन के समय हनुमान जी की तीन और शनिदेव की सात परिक्रमाएं करनी चाहिए। हनुमान जी की परिक्रमा करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

    माता दुर्गा की कितनी परिक्रमाएं शुभ हैं?

    जब आप दुर्गा माता की परिक्रमा कर रहे हैं तो ध्यान रखें कि आप माता की चार परिक्रमाएं ही करें। माता दुर्गा के साथ अन्य देवियों की भी चार बार परिक्रमा करना ही शुभ माना जाता है।

    पीपल और बरगद की परिक्रमा के नियम

    जब हम किसी पेड़ की परिक्रमा की बात करते हैं, तो आमतौर पर पीपल और बरगद के पेड़ों की सात बार परिक्रमाएं करने की सलाह दी जाती है।

    देवी-देवताओं की परिक्रमा के नियम

    • आप जब भी किसी भी देवी या देवता की परिक्रमा करते हैं आपको ध्यान रखना है कई हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में ही परिक्रमा करें।
    • आप जिस स्थान से परिक्रमा शुरू करें एक चक्कर उसी स्थान पर पूर्ण माना जाता है।
    • जिन देवी-देवताओं की जितनी संख्या को उचित माना जाता है उतनी ही परिक्रमाएं करें।
    • भूलकर भी मंदिर में उल्टी परिक्रमा न करें।

    यदि आप मंदिर में दर्शन के साथ सही नियमों के अनुसार परिक्रमा करते हैं तो आपको इसके पूर्ण फल मिलते हैं और ईश्वर का आशीर्वाद भी पाने में मदद मिलती है।

  • हथेली की भाग्य रेखा पर शुभ चिन्ह बदलेंगे आपकी किस्मत, 30 की उम्र के बाद मिलेगी सफलता

    नई दिल्ली। हस्तरेखा शास्त्र में हथेली की रेखाओं और चिन्हों को व्यक्ति के जीवन से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि हथेली की भाग्य रेखा व्यक्ति के करियर, सफलता और जीवन में आने वाले बदलावों के संकेत देती है। हस्तरेखा शास्‍त्र के अनुसार, भाग्य रेखा में कुछ विशेष बदलाव या शुभ चिन्ह दिखाई देने पर यह माना जाता है कि व्यक्ति को जीवन के शुरुआती संघर्षों के बाद आगे चलकर बड़ी सफलता मिल सकती है। खासतौर पर उम्र के 30वें पड़ाव पर पहुंचने के बाद कुछ लोगों की किस्‍मत तक पलट जाती है और चीजें सकारात्‍मक होने लग जाती हैं। चलिए जानते हैं कि हथेली की भाग्‍य रेखा पर वो कौन से शुभ चिन्‍ह होते हैं, जो जीवन में अच्‍छे बदलाव ला सकते हैं।

    भाग्य रेखा और उम्र का संबंध
    हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार हथेली के बीच से गुजरने वाली भाग्य रेखा जीवन में करियर और उपलब्धियों से जुड़ी मानी जाती है। माना जाता है कि भाग्य रेखा का हथेली की अन्य रेखाओं से संबंध व्यक्ति के जीवन के अलग-अलग पड़ावों को दर्शाता है।

    जब भाग्य रेखा मस्तिष्क रेखा को पार करती है, तो इसे कई हस्तरेखा मान्यताओं में लगभग 30 से 35 वर्ष की उम्र के समय से जोड़ा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस उम्र के बाद व्यक्ति अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर सफलता की ओर तेजी से बढ़ सकता है।

    हस्तरेखा शास्त्र में यदि भाग्य रेखा उम्र बढ़ने के साथ अधिक गहरी और स्पष्ट होती दिखाई दे, तो इसे शुभ संकेत माना जाता है। मान्यता है कि ऐसे लोगों को जीवन में धीरे-धीरे सफलता मिलती है और वे अपने अनुभवों के बल पर बेहतर मुकाम हासिल करते हैं।

    कई बार व्यक्ति को कम उम्र में संघर्षों का सामना करना पड़ता है, लेकिन समय के साथ उसकी मेहनत और सही फैसले उसे आगे बढ़ने में मदद करते हैं।

    हथेली पर त्रिशूल का निशान
    हस्तरेखा शास्त्र में त्रिशूल का चिन्ह शुभ माना जाता है। यदि यह निशान भाग्य रेखा के पास या शनि पर्वत के क्षेत्र में दिखाई दे, तो इसे सफलता और उन्नति का संकेत माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा चिन्ह व्यक्ति को 30 से 35 वर्ष की उम्र के बाद करियर में अच्छे अवसर, पद-प्रतिष्ठा और आर्थिक प्रगति का संकेत दे सकता है।

    भाग्य रेखा के पास मछली का चिन्ह
    हथेली पर मछली का चिन्ह भी हस्तरेखा शास्त्र में शुभ माना जाता है। यदि भाग्य रेखा के आसपास मछली जैसा स्पष्ट आकार बनता है, तो इसे भाग्योदय, सम्मान और नए अवसरों से जोड़कर देखा जाता है।

    अत: भाग्य रेखा पर त्रिशूल, मछली या ऊपर उठती शाखाओं जैसे चिन्हों को हस्तरेखा शास्त्र में शुभ माना गया है।

  • ‘ॐ शांतिः शांतिः शांतिः’… क्या आप जानते हैं 3 बार उच्चारण करने के पीछे का असल रहस्य?

    ॐ असतो मा सद्गमय।

    तमसो मा ज्योतिर्गमय।

    मृत्योर्मा अमृतं गमय।

    ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥

    बृहदारण्यक उपनिषद (1.3.28) का यह मंत्र हम सबने कभी न कभी जरूर सुना है। स्कूलों में सुबह की प्रार्थना में यह मंत्र जरूर पढ़ा जाता था। इसका सीधा सा मतलब बहुत ही खूबसूरत है कि “हे ईश्वर! हमें झूठ से सच की ओर, अज्ञान के अंधेरे से ज्ञान के उजाले की ओर, और मृत्यु के डर से अमरता की ओर ले चलो।”

    लेकिन, इस मंत्र के अंत में ‘शांति’ शब्द का इस्तेमाल तीन बार क्यों किया गया है? सिर्फ इसी मंत्र में नहीं, सनातन धर्म के लगभग हर वैदिक मंत्र या पूजा-पाठ के अंत में ‘ॐ शांतिः शांतिः शांतिः’ जरूर बोला जाता है। क्या यह महज एक संयोग है या इसके पीछे कोई विज्ञान है?

    हमारे शास्त्रों में हर नियम के पीछे एक बहुत ही तार्किक और गहरा कारण छुपा हुआ है। हिंदू धर्मग्रंथों और वेदांत दर्शन के अनुसार, मनुष्य के जीवन में मुख्य रूप से तीन तरह के दुख या बाधाएं आती हैं। इन्हीं तीन तापों (कष्टों) से मुक्ति पाने के लिए शांति का तीन बार उच्चारण किया जाता है:

    • पहला ‘शांति’:
      मंत्र के अंत में पहली बार शांति कहने का मतलब होता है हमारे अंदर की अशांति को खत्म करने के लिए। हमारे मन का डर, क्रोध, लालच, चिंता और शारीरिक बीमारियां यह सब इसी शांति में आते हैं। जब हम पहली बार शांति बोलते हैं, तो हम प्रार्थना करते हैं कि हमारा अपना मन और शरीर पूरी तरह शांत और स्वस्थ रहे।
    • दूसरा ‘शांति’:
      यह हमारे आस-पास के माहौल से जुड़ी परेशानियों के लिए है। जैसे कोई दुश्मन, जंगली जानवर या किसी दूसरे इंसान से मिलने वाला दुख। दूसरी बार शांति बोलने का मतलब है कि हमारे आस-पास के सभी जीव और लोग शांत रहें।
    • तीसरा ‘शांति’:
      हम तीसरी बार शांति उन दैवीय या प्राकृतिक आपदाओं के लिए बोलते हैं जिन पर हमारा कोई बस नहीं चलता। जैसे भूकंप, बाढ़, तूफान या महामारी। तीसरी बार अपनी आवाज को धीमा कर शांति बोलकर हम ब्रह्मांड और अदृश्य शक्तियों से प्रार्थना करते हैं कि प्रकृति में संतुलन बनाते हैं।

    इस तरह, तीन बार शांति बोलने की यह परंपरा केवल एक रस्म नहीं है। यह खुद को, अपने समाज को और पूरी प्रकृति को एक साथ तालमेल में लाने का एक शानदार तरीका है।

  • ऐसे लोगों की मदद करने पर खुद बर्बादी के रास्ते पर आ जाता है इंसान, जानिए क्या कहती है चाणक्य नीति?

    आचार्य चाणक्य को भारत के सबसे महान विद्वानों और कूटनीतिज्ञों में गिना जाता है. उनकी कही बातें आज भी इंसानी जिंदगी में बिल्कुल सही बैठती हैं. चाणक्य जी का मानना था कि इंसान को हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए. मदद करना एक बहुत अच्छा गुण है.

    लेकिन कई बार बिना सोचे समझे की गई मदद खुद हमारे लिए जी का जंजाल बन जाती है. चाणक्य नीति में ऐसे 3 तरह के लोगों का जिक्र किया गया है, जिनकी मदद करने पर इंसान खुद मुसीबत में फंस जाता है. अगर आप भी इन लोगों का भला करने की सोच रहे हैं, तो रुक जाइए. वरना आपकी अच्छाई ही आपको कंगाली और बर्बादी के मोड़ पर खड़ा कर सकती है.

    दुष्ट और बुरे स्वभाव की स्त्री या पुरुष
    चाणक्य नीति के अनुसार, जो इंसान दिल का काला और बुरे स्वभाव का होता है, उससे हमेशा दूरी बनाकर रखनी चाहिए. ऐसे लोगों की मदद करना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है.

    दुष्ट स्वभाव के लोग किसी के सगे नहीं होते. आप चाहे उनके लिए कितना भी अच्छा क्यों न कर लें, वे सही मौका मिलते ही आपको नुकसान पहुंचाने से पीछे नहीं हटेंगे.

    ऐसे लोगों को सहारा देने से आपकी खुद की सामाजिक इज्जत और छवि पर बुरा असर पड़ता है. इसलिए ऐसे स्वभाव वाले लोगों के मामलों से खुद को दूर रखना ही समझदारी है.

    हमेशा बिना वजह दुखी रहने वाले लोग
    दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बिना किसी बड़ी वजह के हमेशा रोते रहते हैं. उनके पास सब कुछ होते हुए भी वे अपनी किस्मत और परिस्थितियों को कोसते रहते हैं.

    चाणक्य जी कहते हैं कि ऐसे नकारात्मक सोच वाले लोगों की मदद करने से बचना चाहिए. ऐसे लोग कभी भी अपनी जिंदगी में खुश या संतुष्ट नहीं हो सकते.

    अगर आप उनकी मदद करेंगे, तो उनकी नकारात्मक ऊर्जा आपके जीवन पर भी असर डालने लगेगी. धीरे धीरे आप भी मानसिक तनाव के शिकार हो जाएंगे और अपनी खुशियां खो बैठेंगे.

    मूर्ख और बिना दिमाग वाले इंसान को उपदेश
    किसी मूर्ख व्यक्ति को ज्ञान देना या उसकी मदद करना सबसे बेवकूफी भरा काम माना जाता है. जो इंसान अपनी भलाई बुराई नहीं समझता, उसे कोई बात समझाना पूरी तरह से समय की बर्बादी है.

    जब आप किसी मूर्ख इंसान को सही रास्ता दिखाने की कोशिश करते हैं, तो वह आपकी बात को गलत समझ बैठता है. ऐसे लोग अक्सर मदद करने वाले को ही अपना दुश्मन मान लेते हैं. इनसे बहस करने या इनकी मदद करने के चक्कर में आपका मानसिक सुकून पूरी तरह से छिन सकता है.

    मदद करते वक्त इन बातों का रखें ध्यान
    मदद करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप खुद को जोखिम में डाल लें. आचार्य चाणक्य कहते हैं कि दया भाव रखना अच्छी बात है, लेकिन अपनी समझ का इस्तेमाल करना भी उतना ही जरूरी है.

    किसी की भी मदद करने से पहले उसकी नीयत और व्यवहार को अच्छे से परख लें. अगर आपको लगता है कि सामने वाला इंसान आपके भले का गलत फायदा उठा सकता है, तो तुरंत पीछे हट जाएं. अपनी सीमाएं तय करना सीखें ताकि आपकी अच्छाई का कोई नाजायज फायदा न उठा सके.

    सही इंसान की मदद से बदलती है किस्मत
    जब आप किसी जरूरतमंद, ईमानदार और सही इंसान की मदद करते हैं, तो उसका फल आपको जरूर मिलता है. सही इंसान की मदद करने से मन को शांति मिलती है और समाज में आपका मान सम्मान बढ़ता है.

    चाणक्य नीति हमें यही सिखाती है कि हमारी दयालुता का सही जगह इस्तेमाल होना चाहिए. जब आप सही जगह और सही इंसान पर अपनी ऊर्जा और पैसा लगाते हैं, तभी आपके घर में बरकत आती है. इसलिए हमेशा अपनी आंखें खुली रखें और सही गलत का फर्क समझकर ही हाथ आगे बढ़ाएं.

    
    
  • अंतिम संस्कार के समय मृतक के मुंह में सोने का टुकड़ा रखने की परंपरा क्यों है? गरुड़ पुराण में छिपा है रहस्य

    हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के कई नियम बनाए गए हैं और उनका पालन जरूरी माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि कोई व्यक्ति इन नियमों का पालन करता है तो मृतक की आत्मा को मुक्ति मिलने के साथ उनके वंशजों के जीवन में भी खुशहाली आती है।

    गरुड़ पुराण में भी कई बातों का जिक्र किया गया है और उसके अनुसार ही मृत व्यक्ति को मुखाग्नि दी जाती है। जिस प्रकार मृतक को स्नान कराने के बाद नए कपड़े पहनाए जाते हैं और यदि कोई सुहागिन स्त्री का अंतिम संस्कार किया जाता है तब उसका सोलह श्रृंगार किया जाता है।

    यही नहीं मृतक के मुख में तुलसी और गंगाजल रखने की परंपरा का पालन भी सदियों से किया जा रहा है, लेकिन क्या आप जानते हैं एक और रस्म के बारे में जिसमें मृत व्यक्ति के मुख में सोने का टुकड़ा रहा जाता है। आइए आपको बताते हैं मृतक के मुख में सोने का टुकड़ा रखने के पीछे की मान्यता के बारे में क्या कहता है गरुड़ पुराण?

    मृतक के मुख में सोने के टुकड़ा क्यों रखते हैं?

    मृतक के मुंह में सोने का टुकड़ा उसे चिता पर लेटाने से पहले रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोना एक पवित्र और शुभ धातु मानी जाती है इसलिए, कहा जाता है कि मृतक के मुख में सोना रखने से आत्मा शुद्ध होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

    जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसके परिवार के लोग ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं। ऐसे में मुख में सोना रखने का एक मात्र उद्देश्य मृतक को सांसारिक मोह-माया से मुक्ति दिलाना होता है। सोना एक ऐसी धातु है ही मृत आत्मा के लिए स्वर्ग के द्वार खोलती है, इसी वजह से यह मृत व्यक्ति के लिए अंतिम यात्रा को आसान बनाती है।

    गरुड़ पुराण में लिखी है यह बात

    यदि हम गरुड़ पुराण की मानें तो हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के समय मुख में तुलसी, गंगाजल और सोना रखने से पवित्रता बनी रहती है।

    मृतक के शरीर की अशुध्दियां दूर हो सकती हैं और स्वर्ण को एक ऐसी धातु माना जाता है जो कि अग्नि में तपने के बाद भी अपनी पवित्रता नहीं खोता है, इसलिए मृतक के मुख में सोना धातु का एक छोटा सा टुकड़ा जरूर रखा जाता है।

    इससे मृत आत्मा को सम्मान भी मिलता है। इसके साथ ही, मृत्यु के समय भौतिक शरीर पंचतत्वों में विलीन होते समय अशुद्ध न हो जाए, इसलिए सोना मुख में रखा जाता है।

    मृतक को पापों से मुक्ति मिलती है

    यदि मृत व्यक्ति के मुख में सोने का एक टुकड़ा रखा जाता है तो उसे जीवन पर्यन्त किए गए किसी भी पाप से मुक्ति मिल सकती है और इसे मोक्ष पाने का माध्यम माना जाता है। यदि नहीं ऐसा करने से यम का भय भी दूर होता है और आत्मा की आगे की यात्रा आसान हो जाती है।

    गरुड़ पुराण में बताया गया है कि व्यक्ति के मुख में रखा हुआ सोने का एक छोटा सा टुकड़ा मोक्ष दिलाने और प्रेत योनि से बचाने में मदद करता है।

    मृतक के मुख में सोने का टुकड़ा रखना सिर्फ एक रस्म नहीं है बल्कि आत्मा के लिए मुक्ति का द्वार भी खोलने में मदद करती है।

  • रात में बाहर न टांगें कपड़े! जानिए क्यों वास्तु और साइंस दोनों मानते हैं इसे बड़ा नुकसान

    अक्सर हम लोग अलस में आकर रात को धुले कपड़े बाहर बालकनी या छत पर सुखाने डाल देते हैं. या फिर दिन के सूखे कपड़े भी रात भर बाहर रस्सी पर ही लटके छोड़ देते हैं. अगर आप भी ऐसा करते हैं, तो जरा संभल जाइए. बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते हैं कि शाम ढलते ही कपड़े अंदर ले आने चाहिए. वास्तु शास्त्र में रात को कपड़े बाहर छोड़ना सही नहीं माना जाता. कहते हैं इससे घर में किचकिच और निगेटिव वाइब्स आती हैं. सिर्फ पूजा-पाठ या वास्तु ही नहीं, साइंस के हिसाब से भी रात में कपड़े सुखाना सेहत के लिए नुकसानदायक है.

    घर में नेगेटिविटी बढ़ने का डर
    वास्तु के हिसाब से दिन और रात के माहौल में बहुत फर्क होता है. रात के समय खुली हवा में गीले कपड़े छोड़ने से उनमें निगेटिव एनर्जी समाने लगती है. सिर्फ गीले ही नहीं, सूखे कपड़ों पर भी रात की ओस और हवा का असर पड़ता है. यही वजह है कि रात भर बाहर टंगे कपड़े पहनने से घर में भारीपन महसूस होता है और बात-बात पर तनाव या चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है.

    दाद, खुजली और स्किन एलर्जी की आफत
    अब अगर साइंस की बात करें, तो रात के वक्त हवा में नमी यानी ओस बहुत ज्यादा होती है. इससे कपड़े रात भर में पूरी तरह सूख ही नहीं पाते.

    कपड़ों में सीलन और नमी बनी रहने की वजह से उनमें फंगस और कीटाणु पनपने लगते हैं. जब आप ये कपड़े पहनते हैं, तो दाद, खाज, खुजली और स्किन एलर्जी जैसी परेशानियां घेर लेती हैं.

    धूप की ताकत और फायदे
    कपड़ों को हमेशा दिन में सूरज की कड़क धूप और ताजी हवा में ही सुखाना सबसे बेहतर होता है. धूप कपड़ों की सीलन को पल भर में खत्म कर देती है.

    सूरज की किरणें एक तरह से नेचुरल सैनिटाइजर की तरह काम करती हैं, जो कपड़ों के सारे जर्म्स और बैक्टीरिया को मार देती हैं. धूप में सूखे कपड़ों से कोई अजीब सी बदबू भी नहीं आती और वे एकदम फ्रेश रहते हैं.

    शाम होने से पहले समेट लें कपड़े
    अपनी आदत में थोड़ा बदलाव करें और सुबह-सुबह कपड़े धोने की कोशिश करें ताकि दोपहर तक वे धूप में अच्छे से सूख जाएं.

    जैसे ही सूरज ढलने लगे, यानी शाम होने से पहले सारे कपड़े बाहर से उठाकर घर के अंदर रख लें. अगर कोई कपड़ा थोड़ा-बहुत गीला रह भी जाए, तो उसे रात में कमरे में पंखे के नीचे सुखा लें, लेकिन बाहर बिल्कुल न छोड़ें.

    बुजुर्गों की बात में छुपा है बड़ा लॉजिक
    हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग जो भी नियम-कायदे बनाते हैं, उनके पीछे वास्तु के साथ-साथ सेहत से जुड़ा लॉजिक भी होता है. रात में कपड़े बाहर न सुखाना कोई अंधविश्वास नहीं है.

    यह आपके परिवार की अच्छी सेहत और घर में पॉजिटिव माहौल बनाए रखने का एक आसान तरीका है. इसलिए आज से ही अपनी आदत बदलें और शाम होने से पहले कपड़े अंदर लाने का नियम बना लें.

    
    
  • क्या आप भी बांधते हैं पैर में काला धागा? संभल जाएं, इन राशियों के लिए हो सकता है बेहद खतरनाक

    Astro Tips:क्यों हाथ-पैर में काला धागा पहनती हैं महिलाएं? जानें क्या है  इसके चमत्कारी फायदे - Why Do Women Wear Black Thread On Their Hands And  Feet Know Its Miraculous Benefits - Amar Ujala Hindi News Live

    अक्सर आपने लोगों को पैर में काला धागा बांधे हुए देखा होगा। कई लोग इसे केवल एक फैशन, ट्रेंड या पुरानी परंपरा मानकर पहन लेते हैं। ज्योतिष शास्त्र में इसका बहुत गहरा और खास महत्व माना गया है। एस्ट्रोपत्री के श्री चंद्रेश शर्मा के अनुसार, पैर में काला धागा बांधना सिर्फ एक सामान्य रिवाज नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध हमारी कुंडली में ग्रहों की स्थिति और शरीर के आसपास मौजूद ऊर्जा से होता है। सही जानकारी और नियम के साथ धारण किया गया काला धागा जहां जीवन में सकारात्मकता लाता है।

    किसे पहनना चाहिए और क्या हैं इसके फायदे?

    ज्योतिष शास्त्र में काला धागा मुख्य रूप से नकारात्मक ऊर्जा और बुरी नजर से रक्षा करने के लिए धारण किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति को बार-बार नजर लगने की समस्या रहती है या काम बनते-बनते बिगड़ जाते हैं, तो पैर में काला धागा बांधना बेहद फायदेमंद माना जाता है।

    इसके अलावा, यह शनि देव के अशुभ प्रभाव को कम करने के साथ-साथ राहु और केतु जैसे छाया ग्रहों के दोष से भी बचाव करता है। खासकर मकर और कुंभ राशि के जातकों के लिए काला धागा धारण करना बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है। मकर और कुंभ राशि के स्वामी शनि देव हैं और काला रंग शनि देव का प्रिय रंग है। इसलिए इन दो राशियों के लोग यदि पैर में काला धागा पहनते हैं, तो उन्हें मानसिक शांति, आर्थिक मजबूती और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।

    किसे नहीं पहनना चाहिए और क्या है कारण?

    जहां कुछ राशियों के लिए काला धागा सुरक्षा-कवच की तरह काम करता है, वहीं कुछ लोगों के लिए इसे धारण करना पूरी तरह वर्जित माना गया है। ज्योतिषीय नियमों के अनुसार, मेष और वृश्चिक राशि के लोगों को पैर में काला धागा बांधने से हमेशा बचना चाहिए।

    इसके पीछे का मुख्य कारण यह है कि मेष और वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल देव हैं। मंगल ग्रह को ऊर्जा, साहस, अग्नि और लाल रंग का कारक माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मंगल देव का काले रंग के साथ मित्रवत भाव नहीं होता है। जब मेष या वृश्चिक राशि के जातक काला धागा पहनते हैं, तो मंगल का शुभ प्रभाव कम होने लगता है। इसके कारण जीवन में बेवजह का तनाव, गुस्सा, धन हानि या बनते कामों में रुकावटें आने लगती हैं।

    इसलिए, पैर में काला धागा बांधने से पहले अपनी राशि और ग्रहों के प्रभाव को समझना बेहद जरूरी है, ताकि इसका सही और पूरा लाभ आपको मिल सके।