खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें

या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) शिमला ने आलू की खेती को जलवायु जोखिमों से बचाने के लिए टिशू कल्चर की मदद से आलू बीज तैयार करने की हाईटेक तकनीक इजाद की है। इस तकनीक से तैयार आलू बीज बदलते मौसम, बढ़ते तापमान और अनियमित बारिश के बावजूद बेहतर फसल तैयार करने में सक्षम है। इस तकनीक का मकसद कम समय में रोग मुक्त और गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री किसानों को उपलब्ध कराना है। सीपीआरआई के वैज्ञानिक प्रयासों से देश में आलू की उत्पादकता बढ़ी है। सीपीआरआई की ओर से आलू बीज उत्पादन के लिए इस्तेमाल की जा रही हाईटेक तकनीक से आलू उत्पादन की दर शुरुआती दशकों के 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर वर्तमान में 35 से 40 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई है। पारंपरिक बीज उत्पादन में मिट्टी जनित और वायरल रोगों का खतरा बना रहता है। पछेती झुलसा, वायरस और आलू सिस्ट नेमाटोड जैसी समस्याएं बीज की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को प्रभावित करती हैं।
सीपीआरआई ने नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण में टिशू कल्चर के माध्यम से वायरस-मुक्त रोपण सामग्री तैयार की है। रैपिड मल्टीप्लिकेशन के जरिये कम समय में स्वस्थ सूक्ष्म कंद और जनक बीज बनाए जा रहे हैं। इससे पारंपरिक उत्पादन चक्र पर निर्भरता कम हुई है। किसानों को शुद्ध और रोग मुक्त बीज उपलब्ध कराने की क्षमता बढ़ी है। सीपीआरआई की रणनीति केवल रोग मुक्त बीज तक सीमित नहीं है। टिशू कल्चर से तैयार बीज को गर्मी, सूखे और जल तनाव सहन करने वाली नई किस्मों से जोड़ा जा रहा है। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के अनुरूप किस्में विकसित करने के लिए संस्थान स्पीड ब्रीडिंग तकनीक का उपयोग कर रहा है। इसके जरिये एक वर्ष में तीन से चार जेनरेशन तैयार की जा सकती हैं। आलू की खेती में मौसम और रोग प्रबंधन को जोड़ने के लिए सीपीआरआई ने इंडो ब्लाइट कास्ट पूर्वानुमान मॉडल विकसित किया है। इसका इस्तेमाल पछेती झुलसा बीमारी के प्रबंधन में होता है। मौसम की परिस्थितियों के आधार पर रोग के जोखिम का पूर्वानुमान मिलने से किसान समय पर छिड़काव कर सकते हैं।
टिशू कल्चर-एरोपोनिक्स से आलू बीज उत्पादन को नई रफ्तार
टिशू कल्चर और एरोपोनिक्स तकनीक के तालमेल से आलू के रोगमुक्त और गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन को नई गति मिल रही है। टिशू कल्चर तकनीक में प्रयोगशाला के रोगाणुहीन वातावरण में मेरिस्टेम से वायरस-मुक्त छोटे पौधे तैयार किए जाते हैं। इसके बाद इन्हें बिना मिट्टी वाले एरोपोनिक्स ग्रीनहाउस में विकसित किया जाता है। यहां पौधों की जड़ों को हवा में लटकाकर पोषक तत्वों की फुहार दी जाती है, जिससे मिनी ट्यूबर तैयार होते हैं। पारंपरिक मिट्टी की खेती में एक पौधे से करीब 8 से 10 कंद मिलते हैं, जबकि एरोपोनिक्स से 40 से 60 मिनी ट्यूबर तक प्राप्त किए जा सकते हैं। इससे बीज उत्पादन की क्षमता कई गुना बढ़ती है।
आलू बीज उत्पादन के लिए सीपीआरआई हाईटेक तकनीक पर काम कर रहा है। इस तकनीक से आलू बीज की गुणवत्ता में बेहतरीन सुधार हुआ है, जिसके फलस्वरूप आलू उत्पादन में भी बढ़ोतरी हुई है।– डाॅ. ब्रजेश सिंह, निदेशक, सीपीआरआई
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android , iOS और अपने मोबाइल पे|
Get all in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more .
Leave a Reply