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  • दिल्ली में एच1एन1 का प्रकोप, 24 घंटे में 166 नए मामले, स्वास्थ्य मंत्री ने तैयारियों का लिया जायजा

    दिल्ली में एच1एन1 के बढ़ते मामलों के बीच स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने द्वारका स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल का निरीक्षण कर तैयारियों का जायजा लिया. पिछले 24 घंटों में राजधानी में एच1एन1 के 166 नए मामले सामने आए हैं, जिसके बाद कुल संक्रमितों की संख्या बढ़कर 2,612 हो गई है. वहीं, इन्फ्लूएंजा-A के कुल मामले करीब 3,300 तक पहुंच गए हैं. दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने अस्पताल में बनाए गए विशेष एच1एन1 आइसोलेशन वार्ड का निरीक्षण किया और मरीजों के इलाज और देखभाल की व्यवस्थाओं की समीक्षा की.

    उन्होंने अस्पताल के डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों से बातचीत कर बेड, ऑक्सीजन, दवाइयों, फ्लूइड, टेस्टिंग और अन्य जरूरी चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता की जानकारी ली.

    अस्पताल में एच1एन1/स्वाइन फ्लू के लिए विशेष क्लिनिक भी बनाया गया है. यहां संदिग्ध मरीजों की प्रारंभिक जांच की जाएगी. संक्रमण की पुष्टि होने पर मरीजों को आवश्यकता के अनुसार विशेष एच1एन1 वार्ड में भर्ती कर इलाज और निगरानी की जाएगी.

    क्या बोले स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज

    स्वास्थ्य मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने कहा कि दिल्लीवासियों को घबराने की जरूरत नहीं है. दिल्ली सरकार और स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह तैयार हैं. अस्पतालों में डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, लैब टेक्नीशियन, दवाएं, ऑक्सीजन, बेड और टेस्टिंग सुविधाएं उपलब्ध रखी गई हैं. स्वास्थ्य मंत्री डॉ पंकज सिंह ने कहा कि सरकार संभावित रूप से मामलों में होने वाली बढ़ोतरी को देखते हुए पहले से तैयारियां कर रही है. जरूरत पड़ने पर अस्पतालों की क्षमता और चिकित्सा सुविधाओं को और मजबूत किया जाएगा. स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि वह स्वयं स्थिति पर लगातार नजर रख रहे हैं और नियमित रूप से अस्पतालों का निरीक्षण कर रहे हैं.

    स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और मेडिकल सुपरिटेंडेंट/मेडिकल डायरेक्टर को सभी जरूरी तैयारियां सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं. उन्होंने कहा कि ये निरीक्षण आगे भी जारी रहेंगे और जरूरत पड़ने पर वह किसी भी समय किसी भी अस्पताल का दौरा कर सकते हैं. उन्होंने अस्पताल में लोगों को एच1एन1 से बचाव, लक्षणों और सावधानियों के प्रति जागरूक करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे आईईसी मटेरियल की भी समीक्षा की.

    स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि मौजूदा स्थिति पर स्वास्थ्य विभाग गंभीरता से नजर रख रहा है और मरीजों को समय पर बेहतर इलाज उपलब्ध कराने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं. अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और लैब टेक्नीशियन समेत जरूरी चिकित्सा संसाधन उपलब्ध हैं.

    इन चीजों का ध्यान रखने के निर्देश

    स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में दिल्ली सरकार मौसमी बीमारियों से निपटने के लिए स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दे रही है. सभी सरकारी अस्पतालों को सतर्क रहने और मामलों में बढ़ोतरी होने पर तत्काल प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं.

    स्वास्थ्य मंत्री ने दिल्लीवासियों से अपील की कि वे अनावश्यक रूप से भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें, नियमित रूप से साबुन-पानी से हाथ धोएं या सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें. उन्होंने बच्चों और बुजुर्गों की विशेष देखभाल करने तथा किसी भी स्वास्थ्य संबंधी परेशानी की स्थिति में चिकित्सकीय सलाह लेने की अपील की.

    उन्होंने कहा कि एच1एन1 के लक्षण सामान्य मौसमी फ्लू या बुखार जैसे हो सकते हैं और उचित इलाज एवं चिकित्सकीय निगरानी से मरीज ठीक होकर घर लौट रहे हैं. दिल्ली सरकार का लक्ष्य किसी भी संभावित स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार रहना और मरीजों को समय पर जरूरी उपचार उपलब्ध कराना है.

  • क्या कोरोना की तरह देशभर में फैल सकता है स्वाइन फ्लू? क्या कहते हैं डॉक्टर

    दिल्ली में एच1एन1 इंफ्लुएंजा के बढ़ते मामलों ने लोगों और राज्य सरकार की चिंता बढ़ा दी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक 24 घंटे में 166 नए केस सामने आए हैं. इस नए अपडेट के बाद इसके मरीजों की संख्या बढ़कर 2,612 हो गई है. इसके अलावा इन्फ्लूएंजा-ए के मामले भी सामने आ रहे हैं और इन्हें मिलाकर कुल केस करीब 3,300 तक पहुंच गए हैं. दिल्ली सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि राज्य के लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है. सरकार और हेल्थ डिपार्टमेंट पूरी तरह तैयार है. हॉस्पिटल्स में डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, लैब टेक्नीशियन, दवाएं, ऑक्सीजन, बेड और टेस्टिंग सुविधाएं उपलब्ध रखी गई हैं.

    एच1एन1 के मामले बढ़ने के बाद लोगों के मन में यह सवाल आना लाजमी है कि कहीं यह भी कोरोना की तरह पूरे देश में तो नहीं फैल रहा. फिलहाल दोनों की तुलना करना सही नहीं होगा. एच1एन1 नया वायरस नहीं है.

    डॉक्टर ने क्या कहा?

    यशोदा अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन विभाग में एसोसिएट डायरेक्टर डॉ विनय भट्ट ने बताया कि यह इन्फ्लुएंजा वायरस है और इसके मामले समय-समय पर बढ़ते रहे हैं. वे कहते हैं कि मामलों में बढ़ोतरी को सीधे कोरोना जैसी स्थिति मान लेना ठीक नहीं है. एच1एन1 एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक आसानी से पहुंच सकता है, खासकर जब लोग लंबे समय तक एक-दूसरे के करीब हों.

    भीड़ वाली जगहों और बंद कमरों में इसका संक्रमण फैलने का खतरा ज्यादा रहता है. यही वजह है कि एक समय में किसी इलाके या शहर में इसके मामले बढ़ते हुए दिखाई दे सकते हैं.

    इन लोगों में है ज्यादा खतरा

    अधिकतर लोगों में एच1एन1 फ्लू की तरह ही रहता है और कुछ दिनों में आराम के साथ ठीक हो जाता है. लेकिन हर मरीज का जोखिम एक जैसा नहीं होता. बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से अस्थमा, सीओपीडी या दूसरी गंभीर बीमारी वाले मरीजों में संक्रमण ज्यादा गंभीर हो सकता है. ऐसे मरीजों में फेफड़ों तक संक्रमण पहुंचने और निमोनिया होने का खतरा रहता है.

    अगर बुखार लगातार बना हुआ है, खांसी बढ़ रही है या मरीज को सांस लेने में परेशानी हो रही है, तो इसे सामान्य फ्लू समझकर घर पर इंतजार नहीं करना चाहिए. सांस फूलना, सीने में दर्द या ऑक्सीजन का स्तर गिरना खास तौर पर चिंता के संकेत हैं.

    इन बातों का रखें ध्यान

    एच1एन1 से बचाव में फ्लू वैक्सीनेशन भी अहम भूमिका निभा सकता है, खासकर बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हाई-रिस्क मरीजों के लिए. समय पर टीकाकरण संक्रमण के गंभीर होने और उससे जुड़ी जटिलताओं के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है और हाई-रिस्क मरीजों में अस्पताल में भर्ती होने की संभावना भी कम हो सकती है.

    फिलहाल एच1एन1 से बचने के लिए बहुत अलग कुछ करने की जरूरत नहीं है. बीमार हैं तो कुछ दिन घर पर रहें और दूसरों के संपर्क में आने से बचें. खांसते या छींकते समय मुंह ढकें और हाथ साफ रखें. खासकर घर में बुजुर्ग या किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति है, तो उसके पास जाते समय ज्यादा सावधानी रखें.

    एच1एन1 के मामले बढ़ रहे हैं तो सावधानी जरूरी है, लेकिन इसे लेकर कोरोना जैसी स्थिति की आशंका से घबराने की जरूरत नहीं है. संक्रमण का फैलाव और उसकी गंभीरता लगातार निगरानी का विषय जरूर है.

  • मेनोपॉज से पहले शुरू होता है पेरिमेनोपॉज, शरीर में दिखते हैं ये संकेत, डॉक्टर से जानें

    महिलाओं के लाइफ में मेनोपॉज एक नेचुरली फिजिकल चेंज है, जिसमें लगातार 12 महीनों तक पीरियड्स नहीं आते. पर क्या आप जानते हैं कि मेनोपॉज से पहले महिलाओं को पेरिमेनोपॉज से भी गुजरना पड़ता है. बहुत कम इसके बारे में सवाल करते हैं या फिर इसकी जानकारी रखते हैं. आखिर ये क्या है और इसके संकेत क्या होते हैं इस पर टीवी9 ने डॉ. रुचि भंडारी (डायरेक्टर, ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी डिपार्टमेंट, यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल) से खास बातचीत की.

    एक्सपर्ट कहती हैं कि आमतौर पर मेनोपॉज से पहले शरीर में हार्मोनल बदलाव शुरू हो जाते हैं, जिन्हें पेरिमेनोपॉज कहा जाता है. इस दौरान एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन के स्तर में उतार-चढ़ाव होने लगता है, जिसके कारण पीरियड्स के पैटर्न और शरीर में कई बदलाव दिखाई दे सकते हैं.

    पीरियड्स का ठीक से न आना

    डॉक्टर ने बताया पेरिमेनोपॉज का सबसे सामान्य संकेत पीरियड्स में अनियमितता है. कभी पीरियड्स समय से पहले आ सकते हैं, तो कभी कई सप्ताह या महीनों का अंतर हो सकता है. ब्लीडिंग सामान्य से कम या अधिक भी हो सकती है. इसके अलावा अचानक गर्मी महसूस होना या हॉट फ्लैशेज, रात में पसीना आना, नींद में परेशानी, मूड में बदलाव, चिड़चिड़ापन, थकान और एकाग्रता में कमी जैसे लक्षण भी हो सकते हैं. कुछ महिलाओं को योनि में सूखापन, सेक्स के दौरान असहजता, त्वचा में बदलाव या वजन और शरीर की संरचना में परिवर्तन भी महसूस हो सकता है.

    यह समझना जरूरी है कि हर महिला में पेरिमेनोपॉज के लक्षण एक जैसे नहीं होते. कुछ महिलाओं में लक्षण हल्के होते हैं, जबकि कुछ में वे दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए इन्हें केवल उम्र का सामान्य असर मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है.

    35 से 40 की उम्र में प्रोएक्टिव हेल्थ मैनेजमेंट जरूरी

    डॉक्टर कहती हैं कि मिड-लाइफ में महिलाओं के लिए प्रोएक्टिव हेल्थ मैनेजमेंट बेहद महत्वपूर्ण है. संतुलित आहार, पर्याप्त प्रोटीन और कैल्शियम का सेवन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन और धूम्रपान व अत्यधिक शराब से बचाव स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकते हैं. इस उम्र में हड्डियों, हृदय स्वास्थ्य, वजन, ब्लड प्रेशर और अन्य जरूरी स्वास्थ्य मानकों की नियमित निगरानी भी महत्वपूर्ण हो जाती है.

    पेरिमेनोपॉज से जुड़े कई हार्मोनल मिथ्स भी आम हैं. हर हार्मोनल बदलाव का मतलब बीमारी नहीं होता और हर महिला को हार्मोन थेरेपी की जरूरत भी नहीं होती. उपचार का निर्णय लक्षणों, मेडिकल हिस्ट्री और व्यक्तिगत स्वास्थ्य जरूरतों के आधार पर डॉक्टर की सलाह से किया जाना चाहिए. इसी तरह, अनियमित पीरियड्स को हमेशा मेनोपॉज का संकेत मानना भी सही नहीं है, क्योंकि इसके अन्य कारण हो सकते हैं.

    अगर बहुत अधिक या असामान्य ब्लीडिंग हो, लंबे समय तक पीरियड्स न आने के बाद दोबारा ब्लीडिंग हो, या लक्षण बहुत अधिक परेशान कर रहे हों, तो डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है. सही जानकारी, समय पर जांच और स्वस्थ जीवन शैली के साथ पेरिमेनोपॉज और मेनोपॉज को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकता है.

  • जीवन में मान-सम्मान बढ़ाना है तो आचार्य चाणक्य की ये 6 बातें गांठ बांध लें

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमारी आदतें ही होती हैं, जो हमारे बारे में दूसरों के मन में जगह बनाती भी हैं और मिटाती भी हैं। यदि आप भी चाहते हैं कि लोग आपकी कद्र करें और आपको सम्मान दें, तो उसके लिए अपनी आदतों को सुधारें और आज ही चाणक्य नीति में बताई गईं इन छह आदतों को अपनाएं। यदि आप अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ अच्छी आदतों को शामिल कर लेंगे, तो आपको भी लोग इज्जत की नजरों से देखना शुरू कर देंगे। तो चलिए जानते हैं इन 6 आदतों के बारे में।

    समय का सम्मान करें

    आपने इस बारे में तो सुना ही होगा कि जो लोग समय का सम्मान नहीं करते हैं, समय उनका सम्मान नहीं करता है। इसलिए सबसे पहले अपनी आदत में इस बात को शामिल करें कि आज का काम आज ही निपटाएं। कल पर काम छोड़ने वाले आलस्य को त्याग दें। जो लोग इस आदत को अपनाते हैं, लोग उन पर भरोसा करते हैं और यहीं से उनका सम्मान भी बढ़ता है।

    क्रोध पर रखें नियंत्रण

    आप में लाख अच्‍छाई हो, मगर गुस्सा पल भर में आपके सारे अच्‍छे काम पर पानी फेर सकता है। गुस्सा इंसान की समझने और सोचने की क्षमता को प्रभावित करता है। साथ ही यह भी जान लें कि आप जो काम प्‍यार और मोहब्‍बत से किसी से करा सकते हैं, वही काम कितना भी गस्‍सा कर लें, नहीं करा सकते। क्रोध में कही गई एक छोटी-सी बात भी रिश्तों को खराब कर सकती है। इसलिए किसी भी परिस्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय शांत रहने की कोशिश करें। जो व्यक्ति मुश्किल समय में भी खुद पर नियंत्रण रखता है, लोग उसकी तरफ ज्‍यादा आकर्षित होते हैं।

    मीठी और स्पष्ट वाणी बोलें

    आपकी भाषा आपके व्यक्तित्व की पहचान होती है। इसलिए हमेशा बोलते वक्‍त अच्‍छे शब्‍दों का ही प्रयोग करें। सरल, स्पष्ट और विनम्र शब्दों से आप किसी का भी दिल जीत सकते हैं। किसी का अपमान करने या अहंकार से बात करने से लोग आपसे दूरी बना लेते हैं। वहीं, मीठी वाणी और सम्मानजनक व्यवहार लोगों के दिल में आपके लिए जगह बनाता है।

    ज्ञान से कभी जी न चुराएं

    चाणक्य नीति में ज्ञान को बहुत महत्‍व दिया गया है। कभी ऐसा न सोचें कि अब जीवन में आपने सब कुछ सीख लिया है। जिस दिन कोई व्‍यक्ति सोच लेता है कि उसे सब कुछ आता है, बस तब ही उसका पतन शुरू हो जाता है। जीवन में हमेशा कुछ नया सीखने की कोशिश करें। किताबें पढ़ें, अनुभवी लोगों से सीखें और अपनी गलतियों से भी सबक लें।

    सही संगति चुनें

    आपका व्‍यक्तित्‍व बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसी की संगत में है। अगर आप अच्‍छे लोगों की संगत में हैं, तो आपके सोचने और कर्म करने का तरीका वैसा ही होगा। वहीं आप अगर बुरे लोगों की संगती में होंगे, तो आपके आचरण भी वैसे होंगे। इसलिए ऐसे लोगों की संगति चुनें जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें।

    अनुशासन और संयम अपनाएं

    जीवन में अनुशासन व्यक्ति को मजबूत और जिम्मेदार बनाता है। अपने खान-पान, खर्च, इच्छाओं और दैनिक कामों में संतुलन रखें। हर इच्छा को तुरंत पूरा करने की कोशिश न करें। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं और आदतों पर नियंत्रण रखना सीख जाता है, वह कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रख सकता है।

  • पेट में बार-बार गैस और भारीपन रहता है? रोज की ये 4 आसान आदतें अपनाकर पाएं राहत!

    हेल्थ डेस्क। पेट में गैस बनना एक आम समस्या है। गलत खानपान, जल्दी-जल्दी खाना, ज्यादा तला-भुना भोजन और लंबे समय तक बैठे रहने से गैस, पेट फूलना या भारीपन महसूस हो सकता है। कुछ आसान आदतों को अपनाकर इस परेशानी को कम करने में मदद मिल सकती है।

    1. खाना धीरे-धीरे खाएं

    भोजन को अच्छी तरह चबाकर और आराम से खाने की आदत डालें। जल्दी खाने से ज्यादा हवा पेट में जा सकती है, जिससे गैस और पेट फूलने की समस्या बढ़ सकती है।

    2. खाने के बाद थोड़ी देर टहलें

    भोजन के तुरंत बाद लेटने के बजाय कुछ देर हल्की वॉक करें। इससे पाचन प्रक्रिया को बेहतर रखने में मदद मिल सकती है और पेट में भारीपन भी कम हो सकता है।

    3. गैस बढ़ाने वाली चीजें कम करें

    अगर कुछ खाद्य पदार्थ खाने के बाद आपको बार-बार गैस होती है तो उनका सेवन कम करें। बहुत ज्यादा तला-भुना, मसालेदार भोजन और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स से भी दूरी रखना बेहतर है।

    4. पर्याप्त पानी पिएं

    दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना पाचन के लिए जरूरी है। साथ ही भोजन में फाइबर की मात्रा संतुलित रखें और रोजाना शारीरिक गतिविधि को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं।

  • पीरियड्स के दौरान ना करें ये गलतियां, ट्यूब ब्लॉकेज की हो सकती है समस्या!

    symptoms of fallopian tube blocked

    वर्ल्ड मेंस्ट्रुअल हाइजीन डे 28 मई को मनाया जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इसका 28 मई को मनाया जाना सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक समझ है. एक नॉर्मल मेंस्ट्रुअल साइकिल औसतन 28 दिन की होती है और पीरियड्स का ड्यूरेशन औसतन 5 दिन का होता है, इसलिए इसे 28 मई को मनाया जाता है.

    पीरियड्स के दौरान साफ-सफाई का ध्यान दें
    मेंस्ट्रुअल हाइजीन मेंटेन करना बहुत जरूरी है क्योंकि अगर हम पीरियड्स के दौरान साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखेंगे तो शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म दोनों तरह की परेशानियां हो सकती हैं. शुरुआत में इचिंग, जलन, रैशेज, वेजाइनल डिस्चार्ज, यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन और रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इन्फेक्शन जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. अगर इन इन्फेक्शन्स को बार-बार इग्नोर किया जाए या ये रिपीट होते रहें, तो आगे चलकर पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज, पेल्विक पेन, बुखार, ट्यूब्स में सूजन या ट्यूब ब्लॉकेज जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जिसकी वजह से बाद में इन्फर्टिलिटी तक की समस्या हो सकती है. इसलिए मेंस्ट्रुअल हाइजीन को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

    कपड़े वाले पैड्स का ना करें इस्तेमाल
    अब अगर पीरियड प्रोडक्ट्स की बात करें तो मार्केट में कई ऑप्शन्स अवेलेबल हैं. सबसे कॉमन हैं सेनेटरी पैड्स. डिस्पोजेबल पैड्स और कपड़े वाले पैड्स दोनों इस्तेमाल किए जाते हैं क्योंकि ये यूज करने में आसान होते हैं. लेकिन कोई भी पीरियड प्रोडक्ट इस्तेमाल करने से पहले उसका सही साइज चुनना जरूरी है, जो आपकी एज, फ्लो और कम्फर्ट के हिसाब से हो. कपड़े वाले पैड्स को हम बहुत ज्यादा प्रेफर नहीं करते क्योंकि चाहे कितनी भी सफाई कर लें, उन्हें पूरी तरह सैनिटाइज करना मुश्किल होता है और उनमें इन्फेक्शन का खतरा ज्यादा रहता है. चाहे पैड पूरा सोक हुआ हो या नहीं, उसे हर 6 से 8 घंटे में बदल देना चाहिए.अब अगर टैम्पोन और मेंस्ट्रुअल कप की बात करें तो ये दोनों प्रोडक्ट्स वेजाइना के अंदर इस्तेमाल होते हैं, इसलिए इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल करना सीखना जरूरी होता है. एक बार गायनाकोलॉजिस्ट से सही तरीका सीख लेना अच्छा रहता है.

    टैम्पोन का इस्तेमाल
    टैम्पोन में एक धागा होता है जिसकी मदद से उसे बाहर निकाला जाता है. टैम्पोन को 4 से 6 घंटे के अंदर बदल देना चाहिए. रात में टैम्पोन यूज करने से बचना चाहिए क्योंकि अगर इसे 8 घंटे से ज्यादा लगातार रखा जाए तो एक सीरियस बीमारी का खतरा हो सकता है जिसे टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम कहते हैं.

    मेंस्ट्रुअल कप का इस्तेमाल
    मेंस्ट्रुअल कप एक बार समझ आने के बाद काफी आसान और कम्फर्टेबल हो जाता है. इसका फायदा यह है कि यह एनवायरनमेंट फ्रेंडली होता है. कप भरने के बाद उसे निकालकर साफ किया जा सकता है और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर सही तरीके से साफ और सैनिटाइज करके रखा जाए तो एक मेंस्ट्रुअल कप 5 से 8 साल तक आराम से चल सकता है.

    पीरियड पैंटीज का इस्तेमाल
    आजकल पीरियड पैंटीज भी अवेलेबल हैं. इन्हें खासकर किशोरियां या जिनके पीरियड्स अभी शुरू हुए हैं, वो लोग ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. अक्सर इन्हें पैड के साथ यूज किया जाता है ताकि लीकेज का डर कम हो जाए. टैम्पोन और मेंस्ट्रुअल कप का फायदा यह भी होता है कि ये आमतौर पर ज्यादा लीकेज-प्रूफ होते हैं.

    हाइजीन मेंटेन कैसे करें
    अगर मेंस्ट्रुअल हाइजीन मेंटेन करनी है तो कुछ बेसिक बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. हर पीरियड प्रोडक्ट को समय पर बदलना चाहिए. प्रोडक्ट बदलने से पहले और बाद में हाथ जरूर धोने चाहिए. इस्तेमाल किए हुए पैड या दूसरे प्रोडक्ट्स को पेपर या रैपर में लपेटकर बंद डस्टबिन में डालना चाहिए. इन्हें कभी भी टॉयलेट में फ्लश नहीं करना चाहिए.

    इन बातों का ध्यान देना
    पीरियड्स के दौरान रेगुलर नहाना चाहिए और प्राइवेट पार्ट्स को हल्के गुनगुने पानी से साफ करना चाहिए. प्राइवेट पार्ट्स में ज्यादा साबुन, खासकर परफ्यूम वाले साबुन, डियोड्रेंट, टैल्क या एंटीबायोटिक साबुन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. वी-वॉश भी बहुत ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. सिर्फ उन्हीं लोगों को इस्तेमाल करना चाहिए जिन्हें बार-बार इचिंग, रैशेज, डिस्चार्ज या इन्फेक्शन की समस्या होती है. वरना नॉर्मल वेजाइना खुद को नेचुरली क्लीन कर लेती है. डूशिंग भी नहीं करनी चाहिए.

    एक जरूरी बात यह भी है कि सरकार के जन औषधि केंद्रों पर बहुत कम कीमत में सेनेटरी पैड्स उपलब्ध होते हैं. कई जगहों पर लगभग 1 रुपये में एक पैड मिल जाता है ताकि हर महिला तक पीरियड प्रोडक्ट्स की पहुंच हो सके. जन औषधि केंद्र का एक ऐप भी होता है जिसकी मदद से लोग अपने आसपास का सेंटर ढूंढ सकते हैं और वहां से कम कीमत में पीरियड प्रोडक्ट्स और दूसरी दवाइयां ले सकते हैं. अगर हम इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें तो अच्छी तरह मेंस्ट्रुअल हाइजीन मेंटेन कर सकते हैं.

  • लिपस्टिक खरीदने से पहले पढ़ लें ये लिस्ट, सांवली त्वचा पर सबसे ज्यादा खिलेंगे ये 5 लिपस्टिक शेड्स

    इन गुलाबी न्यूड Lipstick Shades के साथ निखारें अपना लुक!

    सही लिपस्टिक शेड आपके पूरे लुक को बदल सकता है. लेकिन अक्सर सांवली त्वचा वाली महिलाएं इस बात को लेकर उलझन में रहती हैं कि कौन-सा रंग उन पर सबसे अच्छा लगेगा. कई बार सिर्फ ट्रेंड देखकर खरीदा गया शेड चेहरे को फीका दिखाने लगता है. ऐसे में ऐसे रंग चुनना बेहतर होता है जो आपकी स्किन टोन को और निखारें. अगर आपकी त्वचा सांवली (Dusky Skin) है, तो ये 5 लिपस्टिक शेड्स आपकी मेकअप किट में जरूर होने चाहिए.

    कॉफी ब्राउन एक क्लासी और एवरग्रीन शेड है. ऑफिस, कॉलेज या रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए यह बेहतरीन माना जाता है. यह रंग चेहरे को नेचुरल और एलिगेंट लुक देता है.

    अगर आप कुछ अलग ट्राई करना चाहती हैं, तो बर्न्ट ऑरेंज या टेराकोटा शेड चुन सकती हैं. यह गर्माहट लिए हुए रंग है, जो सांवली त्वचा की चमक को और उभारता है. खासकर दिन के समय और ट्रेडिशनल आउटफिट्स के साथ यह शेड बेहद खूबसूरत लगता है.

    अगर आपको रेड लिपस्टिक पसंद है, तो ब्रिक रेड सबसे अच्छा विकल्प हो सकता है. इसमें हल्का ब्राउन टोन होता है, जो सांवली त्वचा पर बेहद खूबसूरत लगता है. यह शेड पार्टी से लेकर शादी तक हर मौके पर आपके लुक में चार चांद लगा सकता है.

    अगर आपको न्यूड लिपस्टिक पसंद है, तो हल्के पिंक की बजाय वॉर्म कैरेमल न्यूड चुनें. यह आपकी स्किन टोन के साथ आसानी से ब्लेंड हो जाता है और होंठों को फीका नहीं दिखाता.

    फेस्टिव सीजन, डिनर डेट या किसी खास मौके के लिए डीप वाइन शेड शानदार विकल्प है. यह लिपस्टिक चेहरे को रिच और ग्लैमरस लुक देती है और सांवली त्वचा पर बेहद आकर्षक नजर आती है.

  • मच्छरों का भी होता है फेवरेट इंसान! 119 लोगों की स्टडी में सामने आया चौंकाने वाला राज

    मच्छरों का भी होता है फेवरेट इंसान! 119 लोगों की स्टडी में सामने आया चौंकाने वाला राज

    क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि एक ही कमरे में बैठे कई लोगों में से मच्छर किसी एक इंसान को कुछ ज्यादा ही निशाना बनाते हैं? अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ आपका वहम है, तो ऐसा बिल्कुल नहीं है. साइंस ने भी अब इस बात पर मुहर लगा दी है. फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने 119 लोगों पर की गई एक रिसर्च किया, जिसमें चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि मच्छरों का अपना फेवरेट इंसानी शिकार होता है. आखिर क्यों कुछ खास लोगों का खून मच्छरों को इतना पसंद आता है और क्या आपकी त्वचा से निकलने वाली महक ही इसकी सबसे बड़ी वजह है? आइए जानते हैं इस दिलचस्प स्टडी के पीछे का पूरा सच.

    फ्लोरिडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने 119 लोगों पर यह रिसर्च किया, जिसके रिजल्ट ने चौंका दिया. इसमें दुनिया की तीन ऐसी मच्छर प्रजातियों को शामिल किया गया, जो इंसानों में कई गंभीर बीमारियां फैलाने की क्षमता रखती हैं. रिसर्चर्स ने देखा कि इन तीनों प्रजातियों को इंसानों की गंध और शरीर से निकलने वाले अलग-अलग रासायनिक संकेत किस तरह आकर्षित करते हैं.

    रिसर्च में में एडीज एजिप्टी, एडीज एल्बोपिक्टस और क्यूलेक्स क्विनक्वेफैसिएटस को शामिल किया गया. ये तीनों अलग-अलग बीमारियों को फैलाने में का काम करते हैं. इनमें डेंगू, जीका, येलो फीवर और वेस्ट नाइल जैसी बीमारियां शामिल हैं. इसके रिजल्ट हैरान करने वाले थे. तीनों प्रजातियों ने एक जैसे लोगों को पसंद नहीं किया. हर प्रजाति ने इंसानी शरीर की स्मेल को अपने तरीके से पढ़ा और उसके आधार पर तय किया कि किस इंसान के पास जाना है.

    दरअसल इंसानी शरीर से एक हजार से ज्यादा तरह के वाष्पशील कार्बनिक यौगिक निकल सकते हैं. इनमें से कई के बारे में वैज्ञानिक अभी पूरी तरह नहीं जानते. यही रसायन हमारी प्राकृतिक गंध का हिस्सा बनते हैं और मच्छरों के लिए किसी तरह के संकेत का काम कर सकते हैं.

    रिसर्च में सामने आया कि एडीज एजिप्टी ऐसे लोगों की तरफ ज्यादा आकर्षित हुआ, जिनकी त्वचा में कुछ खास वाष्पशील रसायन कम मात्रा में मौजूद थे और जो शरीर पर कोई अतिरिक्त खुशबू नहीं लगा रहे थे. इस प्रजाति ने पुरुषों की ओर हल्की ज्यादा पसंद भी दिखाई. यह मच्छर दिन के समय ज्यादा एक्टिव रहता है.

    वहीं एडीज एल्बोपिक्टस, जिसे एशियन टाइगर मच्छर भी कहते हैं, इंसान के त्वचा से प्राकृतिक रूप से निकलने वाले कुछ खास केटोन्स और पौधों जैसी गंध वाले रसायनों की तरफ ज्यादा भागते हैं. यह भी दिन में एक्टिव रहने वाली प्रजाति है.

    तीसरी प्रजाति क्यूलेक्स क्विनक्वेफैसिएटस की पसंद और भी अलग निकली. यह मच्छर आमतौर पर रात में ज्यादा एक्टिव होता है और इंसान की स्किन पर मौजूद माइक्रोबायोम यानी बैक्टीरिया, फंगस और दूसरे सूक्ष्मजीवों के समुदाय को पहचानने पर ज्यादा निर्भर करता है.

    हमारी त्वचा पर हमेशा लाखों-करोड़ों सूक्ष्मजीव मौजूद रहते हैं. ये माइक्रोब्स हमारी त्वचा की गंध को प्रभावित करते हैं. स्टडी में खुलासा हुआ है कि कुछ बैक्टीरियल परिवार मच्छरों को इंसान की ओर आने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, वहीं कुछ दूसरे बैक्टीरिया उन्हें दूर रखने वाले संकेत दे सकते हैं.

    यह रिसर्च वैज्ञानिक जर्नल आईसाइंस में प्रकाशित हुआ है. रिसर्च टीम का नेतृत्व एफआईयू के न्यूरोजेनेटिसिस्ट मैथ्यू डीगेनारो कर रहे थे, वहीं इस रिसर्च की अगुवाई पीएचडी छात्रा कायली मारेरो ने की. रिसर्चर्स के अनुसार, इसके नतीजे भविष्य में मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों को रोकने के नए तरीके विकसित करने में मदद कर सकते हैं.

  • दिन में 6-7 घंटे मोबाइल देखते है बच्चे तो हो जाएं सावधान… रील्स-शॉर्ट्स के चक्कर में घट रही शब्दों की दुनिया

    Kids Reels Addiction : स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर दो से पांच वर्ष की उम्र के बच्चे दिन में एक घंटे से अधिक समय मोबाइल और टैबलेट पर वीडियो देखकर बिताते हैं तो उनके मस्तिष्क के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के वर्षों में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ी है जिन्हें बोलने में देरी की शिकायत के साथ अस्पताल लाया जा रहा है और इनमें कई मामलों में अत्यधिक स्क्रीन देखने तथा माता-पिता के साथ सीमित संवाद जैसी बातें सामने आती हैं। रोहिणी स्थित डॉ.बाबा साहेब आंबेडकर अस्पताल में वरिष्ठ रेजिडेंट बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.राहुल दराल ने कहा कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम, खासकर ‘रील्स’ और ‘शॉर्ट्स’ जैसे तेजी से बदलने वाले वीडियो, छोटे बच्चों में बोलने की क्षमता के विकास और एकाग्रता पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं।

    राजधानी से सामने आया हैरान करने वाला मामला
    ऐसा ही एक मामला राष्ट्रीय राजधानी के एक सरकारी अस्पताल में सामने आया। ढाई वर्ष के बच्चे को इसलिए अस्पताल लाया गया क्योंकि वह केवल “मम्मा”, “पापा” और कुछ गिने-चुने शब्द ही बोल पाता था जबकि उसकी उम्र के अन्य बच्चे छोटे-छोटे वाक्य बोलने लगे थे। डॉक्टरों ने बताया कि जांच में उसकी सुनने की क्षमता, दृष्टि, तंत्रिका तंत्र और अन्य विकास संबंधी पहलू सामान्य पाए गए। विस्तृत जानकारी लेने पर पता चला कि वह प्रतिदिन छह से सात घंटे तक मोबाइल फोन पर कार्टून और छोटे वीडियो देखता था। खाना भी वह मोबाइल देखते हुए ही खाता था और फोन हटाने पर चिड़चिड़ा हो जाता था। उन्होंने बताया कि बच्चे में केवल बोलने की क्षमता का विकास अपेक्षाकृत धीमा पाया गया। उसके माता-पिता ने बताया कि दोनों के कामकाजी होने के कारण बच्चे के साथ बातचीत और ‘इंटरैक्टिव’ खेल काफी सीमित हो गए थे।

    पेरेंट्स के लिए खास सलाह
    हालांकि मनोरंजन के लिए स्क्रीन का उपयोग पूरी तरह बंद करने, भोजन के दौरान किसी भी प्रकार की स्क्रीन का उपयोग न करने, प्रतिदिन कम से कम एक घंटे तक माता-पिता द्वारा बच्चे के साथ इंटरैक्टिव खेल खेलने, रोज़ाना चित्रों वाली किताबें पढ़कर सुनाने, रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान बच्चे से लगातार बातचीत करने और ‘स्पीच एवं लैंग्वेज थेरेपी’ शुरू करने की सलाह दी गई जिससे उल्लेखनीय सुधार देखने को मिले। डॉ. दराल ने कहा कि अत्यधिक ‘स्क्रीन टाइम’ के कारण आमने-सामने की बातचीत, कहानी सुनाना, किताबें पढ़ना और खेल जैसी गतिविधियां कम हो जाती हैं और यही गतिविधियां शुरुआती वर्षों में भाषा सीखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती हैं। इसलिए लंबे समय तक स्क्रीन देखने से भाषा का विकास प्रभावित हो सकता है।

    बच्चों के मानसिक विकास पर असर डाल रही रील्स
    उनके अनुसार, ‘रील्स’ और ‘शॉर्ट्स’ जैसे वीडियो हर कुछ सेकेंड में नया कंटेंट दिखाते हैं जिससे मस्तिष्क को लगातार उत्तेजक संकेत मिलते हैं और बच्चों को पढ़ाई, किताबें या अन्य ऐसी गतिविधियां, जिनका परिणाम धीरे-धीरे मिलता है, अपेक्षाकृत कम रोचक लगने लगती हैं। हालांकि, उन्होंने कहा, “ध्यान केंद्रित करने में कमी के लिए केवल ‘रील्स’ या ‘शॉर्ट्स’ को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि, पालन-पोषण का तरीका और घर का वातावरण भी उतने ही महत्वपूर्ण कारक हैं।” डॉ दराल ने बताया, “लगातार स्क्रीन स्क्रॉल करने से मस्तिष्क का ‘रिवॉर्ड सिस्टम’ बार-बार सक्रिय होता है। मस्तिष्क तुरंत मिलने वाले ‘रिवॉर्ड’ का अभ्यस्त हो सकता है। इसके कारण गृह कार्य, पढ़ाई, किताबें पढ़ना या संगीत का अभ्यास जैसी गतिविधियां बच्चों को कम आकर्षक लग सकती हैं।”

    2 से कम उम्र वाले बच्चोंं के लिए खतरनाक स्क्रीन
    उन्होंने सलाह दी कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मनोरंजन के लिए स्क्रीन से दूर रखा जाना चाहिए और दो से पांच वर्ष की आयु के बच्चों में मनोरंजन के लिए स्क्रीन का समय आदर्श रूप से प्रतिदिन एक घंटे से कम होना चाहिए। डॉक्टर ने कहा कि बड़े बच्चों में यह सुनिश्चित करना अधिक महत्वपूर्ण है कि स्क्रीन टाइम के कारण उनकी नींद, पढ़ाई, शारीरिक गतिविधि और परिवार के साथ बिताया जाने वाला समय प्रभावित न हो।

    डॉ दराल ने कहा, “समस्या का समाधान केवल मोबाइल छीन लेना नहीं, बल्कि स्वस्थ डिजिटल आदतें विकसित करना है। इसके लिए भोजन के समय और शयनकक्ष को स्क्रीन-मुक्त रखा जाए, सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन बंद कर दी जाए, बच्चों को प्रतिदिन कम से कम एक घंटा बाहर खेलने या शारीरिक गतिविधि के लिए प्रोत्साहित किया जाए तथा रोजाना कहानी सुनाने, किताब पढ़ने और बातचीत के लिए समय निकाला जाए।” उन्होंने कहा कि माता-पिता स्वयं भी संतुलित स्क्रीन उपयोग का उदाहरण प्रस्तुत करें क्योंकि बच्चे सबसे अधिक सीख अपने आसपास के लोगों को देखकर ही लेते हैं।

  • जरूरत से ज्यादा हेल्दी फूड खाना भी पड़ सकता है भारी, बढ़ सकता है वजन​

    जरूरत से ज्यादा हेल्दी फूड खाना भी पड़ सकता है भारी, बढ़ सकता है वजन​

    यह तो हम सब जानते हैं कि ओवर ईटिंग हमारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होता है। इससे वजन बढ़ सकता है और यह कई तरह की मेडिकल कंडीशन जैसे हाई बीपी, डायबिटीज आदि का कारण भी बन सकता है। इसलिए, कहा जाता है कि हमेशा उतना ही खाएं, जितनी भूख हो और साथ ही हेल्दी खाना खाने की सलाह दी जाती है।

    कई बार यह सवाल उठता है कि क्या हेल्दी खाने से भी नुकसान पहुंच सकता है। अधिक मात्रा में हर चीज बुरी होती है। ज्यादा मात्रा में कोई भी चीज बुरी होती है, फिर चाहे आप स्वस्थ आहार का ही सेवन क्यों नहीं कर रहे हैं।

    डॉक्टर भी मानते हैं कि हेल्दी फूड्स को भी सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए। असल में, हेल्दी फूड्स में भी सीमित मात्रा में कैलोरी होती है। अगर आप ओवर ईटिंग कर बैठते हैं, तो शरीर में कैलोरी की मात्रा बढ़ सकती है। अधिक मात्रा में पौष्टिक आहार का सेवन करने से शरीर उसे फैट की तरह स्टोर करता है।

    हेल्दी फूड खाते हुए वजन को नियंत्रित कैसे रखें?

    हालांकि, यह सच है कि ज्यादा मात्रा में हेल्दी फूड खाने से मेटाबॉलिज्म पर उतना नेगेटिव असर नहीं पड़ता है, जितना जंक या प्रोसेस्ड फूड खाने से होता है। इसके बावजूद, ज्यादा मात्रा में हेल्दी फूड खाना भी सही नहीं है। हेल्दी फूड खाते हुए वजन को नियंत्रित करने के लिए इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

    • पोर्शन कंट्रोल

    हेल्दी फूड को भी सीमित मात्रा में ही खाया जाना चाहिए। खासकर, स्नैक्स और नट्स आदि की मात्रा कम रखें।

    • माइंडफुल ईटिंग करें

    हेल्दी फूड न सिर्फ सीमित मात्रा में खाएं, बल्कि चबाचबाकर खाएं। जैसे ही पेट भर जाएगा, बॉडी को सिग्नल मिलेगा कि अब खाना बंद कर दें।

    • सब्जियां अधिक खाएं

    हेल्दी फूड में भी आपको उन विकल्पों को चुनना चाहिए, जो फैट स्टोरेज को बढ़ावा नहीं देते हैं। इनमें ब्रोकली, आदि शामिल हैं। इस तरह के खानों में कैलोरी की मात्रा कम होती है और इससे पेट भी जल्दी भर जाता है।

    अगर आप अपने वेट को लेकर कॉन्शियस रहते हैं, तो अपने खाने के पोर्शन साइज पर ध्यान देने की जरूरत है। हेल्दी फूड भी अधिक मात्रा में खाया जाना सही नहीं होता है। इससे वजन बढ़ सकता है। मोटापा बढ़ने के साथ ही कई तरह की बीमारियों जैसे डायबिटीज, हाई बीपी, भी बढ़ता है। सीमित मात्रा में हेल्दी फूड खाने से एनर्जी का स्तर बना रहता है और बीमारियों का जोखिम भी कम होता है।